Reading: धारावाहिक लेख (10): मेजर दुर्गा मल्ल का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक है।मेजर दुर्गा मल्ल : आज़ाद हिन्द फौज का गोरखा शेर, जिसने फाँसी के फंदे को भी चुनौती दी

धारावाहिक लेख (10): मेजर दुर्गा मल्ल का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक है।मेजर दुर्गा मल्ल : आज़ाद हिन्द फौज का गोरखा शेर, जिसने फाँसी के फंदे को भी चुनौती दी

RamParkash Vats
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भारत के स्वतंत्र सैनानी धारावाहिक लेख(10)मेजर दुर्गा मल्ल का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में शौर्य, त्याग और राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक

मेजर दुर्गा मल्ल (1 जुलाई 1913 – 25 अगस्त 1944) आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रथम गोरखा सैनिक थे, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। उनका जन्म 1 जुलाई 1913 को देहरादून के निकट डोईवाला गाँव में हुआ। उनके पिता गंगाराम मल्ल छेत्री गोरखा राइफल्स में नायब सूबेदार थे तथा माता का नाम श्रीमती पार्वती देवी छेत्री था। बचपन से ही दुर्गा मल्ल अत्यंत प्रतिभाशाली, अनुशासित और साहसी थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गोरखा मिलिट्री मिडिल स्कूल से प्राप्त की, जिसे आज गोरखा मिलिट्री इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है।

सन 1931 में मात्र 18 वर्ष की आयु में दुर्गा मल्ल गोरखा राइफल्स की 2/1 बटालियन में भर्ती हुए। संकेत (सिग्नल) प्रशिक्षण के लिए उन्हें महाराष्ट्र भेजा गया। लगभग दस वर्षों तक सेना में सेवाएँ देने के बाद जनवरी 1941 में वे धर्मशाला गए, जहाँ उनका विवाह शारदा देवी से हुआ। अप्रैल 1941 में उनकी टुकड़ी सिकंदराबाद पहुँची और 23 अगस्त 1941 को मलाया के लिए रवाना हुई।
8 दिसंबर 1941 को जापान द्वारा मित्र देशों पर आक्रमण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध ने एशिया में विकराल रूप ले लिया। इसी क्रम में 1 सितंबर 1942 को सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन हुआ, जिसमें दुर्गा मल्ल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उनके संगठनात्मक कौशल और राष्ट्रभक्ति से प्रभावित होकर उन्हें मेजर पद पर पदोन्नत किया गया। उन्होंने युवाओं को आज़ाद हिन्द फ़ौज से जोड़ने और गुप्तचर शाखा में अहम जिम्मेदारियाँ निभाईं।
27 मार्च 1944 को मणिपुर में कोहिमा के निकट उखरूल क्षेत्र में महत्वपूर्ण सूचनाएँ एकत्र करते समय वे शत्रु सेना के हाथों पकड़े गए। युद्धबंदी बनाए जाने के बाद उन पर अमानवीय यातनाएँ की गईं। 15 अगस्त 1944 को उन्हें दिल्ली के लाल किले की सेंट्रल जेल लाया गया और अंततः 25 अगस्त 1944 को देश की स्वतंत्रता के लिए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर चढ़ा दिया गया।

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