भारत की स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि असंख्य त्यागों, बलिदानों और अदम्य साहस से रचा गया वह यज्ञ है, जिसकी प्रत्येक आहुति आज भी राष्ट्र की आत्मा को आलोकित करती है। किसी ने तलवार की चमक से अंग्रेजी सत्ता को ललकारा, किसी ने कलम की धार से साम्राज्यवाद की नींव हिलाई, तो किसी ने कालकोठरी की यातनाओं को हँसते-हँसते स्वीकार कर लिया। इन सभी संघर्षों के बीच अनेक ऐसे अमर नाम हैं, जो इतिहास की मुख्यधारा से ओझल रहे, किंतु उनका योगदान स्वतंत्र भारत की नींव में अमिट मोतियों की भाँति जड़ा हुआ है। ऐसे ही एक क्रांतिकारी मोती थे—भाई हिरदा राम।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जनपद में 28 नवंबर 1885 को जन्मे भाई हिरदा राम का जीवन राष्ट्रभक्ति की लौ से प्रारंभ से ही प्रज्वलित था। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस चेतना के प्रतिनिधि थे, जिसने विदेश की धरती पर भी भारत माता की पराधीनता को असहनीय माना। अमेरिका प्रवास के दौरान वे गदर पार्टी से जुड़े—वह क्रांतिकारी संगठन जिसने हथियारों के बल पर अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था। गदर पार्टी के लिए कार्य करना उस समय मृत्यु को आमंत्रण देने जैसा था, किंतु भाई हिरदा राम ने इस जोखिम को राष्ट्र के लिए सौभाग्य माना।
1915 का लाहौर षड्यंत्र मामला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे कठोर और रक्तरंजित अध्यायों में से एक है। इसी मामले में भाई हिरदा राम को आरोपी संख्या 27 के रूप में चिन्हित किया गया। हथियार निर्माण, क्रांतिकारी गतिविधियों और बम विस्फोटों की योजनाओं में संलिप्त होने के आरोप में ब्रिटिश अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 302/109 के अंतर्गत दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुना दी। यह वह क्षण था, जब एक क्रांतिकारी के जीवन का अंत नहीं, बल्कि उसके बलिदान का उत्कर्ष आरंभ होता है।

परंतु इतिहास में कुछ क्षण ऐसे भी होते हैं, जहाँ त्याग के साथ-साथ संघर्ष की करुणा जुड़ जाती है। भाई हिरदा राम की पत्नी सरला देवी ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग से अपील की। उनके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप फांसी की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया गया। किंतु यह राहत केवल नाम की थी—उन्हें अंडमान-निकोबार की सेल्यूलर जेल, अर्थात ‘काले पानी’, भेज दिया गया।
काले पानी की सजा केवल कारावास नहीं थी, वह आत्मा को तोड़ देने वाली यातना थी। भाई हिरदा राम ने वहाँ 40 दिनों से अधिक समय तक अमानवीय पीड़ाएँ सहीं—बेड़ियाँ, एकांत, भूख और अपमान। किंतु न उनके विचार झुके, न उनके संकल्प डिगे। वे उन क्रांतिकारियों में थे, जिनकी आत्मा को जेल की दीवारें भी कैद नहीं कर सकीं। इसी संघर्ष के दौरान उनका संपर्क और वैचारिक साम्य वीर विनायक दामोदर सावरकर जैसे महान क्रांतिकारियों से भी जुड़ा, जिसने उनके राष्ट्रवादी चिंतन को और दृढ़ किया।
स्वतंत्रता के बाद भाई हिरदा राम कारावास से मुक्त हुए। उन्होंने शेष जीवन सादगी, स्मृतियों और मौन गौरव के साथ व्यतीत किया। 21 अगस्त 1965 को उनका निधन हुआ, किंतु उनका जीवन आज भी राष्ट्र के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। वे उन स्वतंत्रता सेनानियों में से हैं, जिनका नाम भले ही इतिहास की पुस्तकों में सीमित स्थान पाए, पर जिनका बलिदान भारत की स्वतंत्रता की आधारशिला में सदा जीवित रहेगा।
भाई हिरदा राम जैसे क्रांतिकारी हमारे लिए केवल अतीत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय धरोहर हैं—वे मोती, जिनकी चमक से भारत का गौरवशाली इतिहास आलोकित होता है। उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह बताना है कि स्वतंत्रता का मूल्य कितना अमूल्य और

