आजादी के नायक भाई हिरदा राम

संपादकीय चिंतन, मंथन और विश्लेषण-संपादक राम प्रकाश वत्स
यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा की कथा नहीं, बल्कि आज़ाद भारत की सामूहिक स्मृति पर लगा वह धब्बा है, जिसे समय के साथ और गहरा किया गया है। आज़ादी के मतवाले महान क्रांतिकारी भाई हिरदा राम का जीवन, संघर्ष और बलिदान हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमने स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति अपने ऐतिहासिक दायित्व का निर्वहन ईमानदारी से किया है, या फिर सत्ता की बदलती प्राथमिकताओं में उन्हें धीरे-धीरे विस्मृति के अंधेरे में धकेल दिया गया।
देवभूमि मंडी केवल शिव-शक्ति और आध्यात्म की भूमि नहीं रही, यह क्रांति की वह धरती भी रही है जहाँ से अंग्रेज़ी हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह की चिंगारी उठी। इसी मिट्टी में जन्मे भाई हिरदा राम मंडी रियासत के उन विरले क्रांतिकारियों में थे, जिन्होंने न केवल विदेशी शासन का विरोध किया, बल्कि जनचेतना को संगठित करने का साहस भी दिखाया। मंडी में गदर पार्टी की स्थापना कर उन्होंने उस आंदोलन को स्थानीय स्वर दिया, जिसने विदेशों में बैठे भारतीयों को भी आज़ादी के लिए हथियार उठाने को प्रेरित किया। यह कोई साधारण योगदान नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सीधी चुनौती थी।
*इतिहास के पन्नों में दर्ज एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने अपनी चिट्ठी में भाई हिरदा राम को अपना प्रेरणा स्रोत बताया। यह उल्लेख मात्र भावनात्मक नहीं, बल्कि उस वैचारिक परंपरा का प्रमाण है, जिसमें क्रांति विचारों से जन्म लेती है और व्यक्तित्व से आकार पाती है। यदि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी किसी को प्रेरणास्रोत मानते हैं, तो उस व्यक्ति का स्थान स्वतंत्रता आंदोलन के शीर्ष पर स्वतः स्थापित हो जाता है। विडंबना यह है कि जिस राष्ट्र की आत्मा ऐसे बलिदानों से निर्मित हुई, उसी राष्ट्र की सरकारें उस आत्मा को पहचानने में विफल रहीं।
ब्रिटिश शासन के दौरान भाई हिरदा राम को दमन, उत्पीड़न और आर्थिक दंड का सामना करना पड़ा। अंग्रेजों ने उनका घर और ज़मीन जब्त कर ली, ताकि एक क्रांतिकारी को न केवल शारीरिक, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी तोड़ा जा सके। यह अपेक्षा स्वाभाविक थी कि आज़ादी के बाद स्वतंत्र भारत उन ज़ख्मों पर मरहम रखेगा, अन्याय की भरपाई करेगा और सम्मान के साथ छीनी गई संपत्ति लौटाएगा। परंतु 72 वर्ष बीत जाने के बाद भी न तो उनका घर वापस मिला, न ज़मीन और न ही वह सम्मान, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे।
यह प्रश्न केवल भाई हिरदा राम तक सीमित नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के ज्ञात-अज्ञात नायकों के साथ भेदभाव किया। जिनके पास सत्ता, प्रचार और राजनीतिक उत्तराधिकार था, वे इतिहास में प्रमुखता से दर्ज हो गए, जबकि जनआंदोलन से जुड़े, वैचारिक क्रांतिकारी हाशिये पर धकेल दिए गए। परिणामस्वरूप, आज उनके परिवारों को अपने पुरखों की विरासत और स्मृति को जीवित रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान का भी है।
स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान देना कोई अनुग्रह नहीं, बल्कि राष्ट्र का नैतिक दायित्व है। भाई हिरदा राम जैसे क्रांतिकारी आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श होने चाहिए थे, ताकि युवा यह समझ सकें कि आज़ादी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि असंख्य बलिदानों का परिणाम है। दुर्भाग्य से, सरकारी उपेक्षा और सामाजिक विस्मृति ने उनके दर्द को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया। जिन अत्याचारों के घाव आज़ादी के बाद भरे जा सकते थे, वे आज भी रिस रहे हैं।
*आज आवश्यकता है गंभीर चिंतन-मंथन की। सरकारों को राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर ऐसे क्रांतिकारियों की पहचान, पुनर्मूल्यांकन और सम्मान करना होगा। भाई हिरदा राम को केवल इतिहास की फुटनोट नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्रीय पात्र के रूप में स्थापित करना समय की मांग है। जब तक यह नहीं होता, तब तक यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज़ाद भारत ने अपने ही एक महान क्रांतिकारी के साथ न्याय नहीं किया।
भाई हिरदा राम स्मारक समिति के सदस्यों का कहना है कि देश की आजादी के बाद भी भाई हिरदा राम को कोई सरकारी सम्मान नहीं मिला। 21 अगस्त 1965 को उनका निधन हुआ।

