NEWS INDIA AAJ TAK ,EDITOR RAM PARKASH VATS:हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल का चिट्टा रखने के आरोपितों को पंचायत चुनाव लड़ने से न रोकने संबंधी बयान राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर गहरी बहस को जन्म दे गया है। यह टिप्पणी केवल एक कानूनी राय नहीं, बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की ओर इशारा करती है।राज्यपाल ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर चुनाव लड़ने से वंचित करना कानूनन सही नहीं है। जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक किसी नागरिक के मौलिक अधिकार छीने नहीं जा सकते। यही लोकतंत्र की मूल आत्मा है। उनके इस कथन के पीछे धारणा यह है कि “आरोप” और “दोष सिद्ध होना” दो अलग-अलग बातें हैं, और दोनों को एक समान मान लेना न्याय की मूल भावना के विपरीत होगा।
हालांकि, राज्यपाल ने यह भी स्वीकार किया कि नशे जैसी सामाजिक बुराई पर केवल कानून के भरोसे काबू नहीं पाया जा सकता। उन्होंने शासन-प्रशासन के साथ-साथ समाज की सामूहिक भूमिका पर जोर दिया। नशे के खिलाफ केवल होर्डिंग लगाने या नारे देने से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि जमीनी स्तर पर जन-जागरूकता अभियान चलाना होगा। जब उन्होंने पूर्व में नशा विरोधी अभियान के दौरान पंचायत प्रतिनिधियों से संवाद किया था, तब कुछ प्रतिनिधियों ने नशे में लिप्त लोगों को पंचायत सुविधाएं न देने का सुझाव रखा था, जिसे उन्होंने असंवैधानिक बताया था।
इस पूरे विमर्श का सार यही है कि नशे के खिलाफ लड़ाई भावनाओं से नहीं, बल्कि कानून, सामाजिक चेतना और नैतिक जिम्मेदारी के समन्वय से लड़ी जानी चाहिए। पंचायत चुनाव लोकतंत्र की जड़ हैं और इन्हें किसी भी तरह के तात्कालिक दबाव या भावनात्मक फैसलों से प्रभावित नहीं किया जा सकता।गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश में 30 अप्रैल से पहले पंचायत चुनाव कराए जाने हैं, जिसको लेकर हाई कोर्ट सरकार को निर्देश दे चुका है। ऐसे में राज्यपाल का यह बयान न केवल समयोचित है, बल्कि यह सरकार और समाज—दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय भी है।

