संकेतिक चित्र
Editor Ram Parkash Vats
हिमाचल में नए शहरों की योजना : नीति, राजनीति और जमीन का सवालहिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा कांगड़ा के लंज, सिरमौर के सराहन और औद्योगिक क्षेत्र बद्दी में हिमुडा के माध्यम से 10–10 हजार बीघा भूमि पर नए शहर बसाने की घोषणा ने प्रदेश की राजनीति को गर्मा दिया है। यह योजना केवल शहरी विकास का विषय नहीं रह गई, बल्कि भूमि अधिग्रहण, पारदर्शिता और राजनीतिक मंशा के प्रश्नों से जुड़कर एक बड़े सार्वजनिक विमर्श में बदल गई है।
जमीन का अधिग्रहण या सरकारी भूमि..?इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील और निर्णायक बिंदु यही है कि क्या सरकार लोगों की निजी जमीन का अधिग्रहण करेगी या फिर यह योजना सरकारी भूमि पर ही साकार होगी।आवास एवं शहरी विकास मंत्री राजेश धर्माणी के अनुसार, अभी तक न तो किसी भूमि का हस्तांतरण हुआ है और न ही निजी भूमि अधिग्रहण का कोई अंतिम निर्णय लिया गया है। सरकार का पक्ष स्पष्ट है कि यह प्रक्रिया प्रारंभिक स्तर पर है और केवल संभावनाओं का आकलन किया जा रहा है।राजनीतिक दृष्टि से यह बयान महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिमाचल जैसे पर्वतीय और सीमित भू-राज्य में भूमि से जुड़ा कोई भी निर्णय जनभावनाओं को सीधे प्रभावित करता है। पूर्व अनुभवों के कारण जनता में यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं विकास के नाम पर किसानों और स्थानीय लोगों की जमीन न छिन जाए। सरकार इसी आशंका को शांत करने का प्रयास कर रही है।
विपक्ष का विरोध : आशंका या अवसर?:-नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेताओं द्वारा इस योजना का विरोध केवल नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक अवसरवाद से भी जुड़ा दिखाई देता है। सरकार का आरोप है कि विपक्ष जनता को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण होगा और निजी बिल्डरों को फायदा पहुंचाया जाएगा।हालांकि, विपक्ष का यह सवाल भी पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता। लोकतांत्रिक राजनीति में भूमि अधिग्रहण जैसी संवेदनशील प्रक्रिया पर निगरानी आवश्यक है। फर्क केवल इतना है कि क्या यह विरोध जनहित में है या सत्ता-विरोध की राजनीति का हिस्सा।
चंडीगढ़ के आसपास नया शहर : रणनीतिक सोच सरकार का तर्क है कि चंडीगढ़ और उसके आसपास बसे मोहाली, पंचकूला, खरड़, जीरकपुर जैसे क्षेत्रों में लगभग 15 हजार हिमाचली परिवारों का पलायन प्रदेश की आवासीय नीति की विफलता को दर्शाता है। नया शहर बसाने की योजना दरअसल आर्थिक पलायन रोकने और शहरी संसाधनों को हिमाचल में ही बनाए रखने की रणनीति है।राजनीतिक विश्लेषण बताता है कि यह कदम सरकार को मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा मतदाताओं के बीच मजबूत करने का प्रयास भी हो सकता है, जो चंडीगढ़ ट्राई-सिटी में बसने को मजबूर हैं।
भाजपा शासनकाल बनाम वर्तमान सरकार:सरकार ने भाजपा के शासनकाल की ओर इशारा करते हुए याद दिलाया कि हिमुडा के तहत लगभग 75 हजार लोगों से आवेदन शुल्क लिया गया, लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आए। यह तर्क राजनीतिक रूप से मजबूत है, क्योंकि यह विपक्ष को उसके ही रिकॉर्ड के आधार पर कठघरे में खड़ा करता है।साथ ही बद्दी-नालागढ़ क्षेत्र में 750 रुपये प्रति बीघा की दर से जमीन आवंटन का मुद्दा उठाकर वर्तमान सरकार खुद को पारदर्शिता और नियम-आधारित नीति का प्रतीक बताने की कोशिश कर रही है।
निति से अधिक विश्वास की परीक्षा :वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि शहर बसेंगे या नहीं, बल्कि यह है कि सरकार भूमि नीति पर जनता का विश्वास जीत पाएगी या नहीं। यदि योजना मुख्यतः सरकारी भूमि पर और पारदर्शी प्रक्रिया से लागू होती है, तो यह हिमाचल के शहरी विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम हो सकता है।लेकिन यदि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अस्पष्ट रही, तो यह योजना राजनीतिक विवादों और जन आंदोलन की भेंट भी चढ़ सकती है।
अतः यह मुद्दा केवल विकास बनाम विरोध का नहीं, बल्कि नीति बनाम विश्वास की कसौटी है—जिस पर सरकार और विपक्ष, दोनों की राजनीति परखी जाएगी।

