
हिमाचल प्रदेश की संस्कृति की झलक
हिमाचल प्रदेश की पहचान उसकी हिमशृंखलाओं जितनी ही उसकी समृद्ध संस्कृति में रची-बसी है। देवभूमि कहलाने वाला यह प्रदेश लोकदेवताओं, मेलों-त्योहारों, लोकनृत्यों, पारंपरिक वेशभूषा, बोली-बानी और सामुदायिक जीवन की सादगी से पहचाना जाता रहा है। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिकता की तेज रफ्तार में वही समाज अपनी जड़ों से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। विकास और सुविधा की चाह में संस्कृति को पीछे छोड़ देने की प्रवृत्ति आज हिमाचल के सामाजिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
शिक्षा, तकनीक और संचार के विस्तार ने जीवन को निश्चय ही आसान बनाया है, परंतु इसके साथ ही पाश्चात्य जीवनशैली का अंधानुकरण भी बढ़ा है। गांवों से शहरों की ओर पलायन, संयुक्त परिवारों का विघटन और स्थानीय भाषाओं का ह्रास—ये सभी संकेत हैं कि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत से कटती जा रही है। कभी घर-घर में गूंजने वाले लोकगीत आज मोबाइल की प्लेलिस्ट में सिमट गए हैं, और देव परंपराएं केवल ‘पर्यटन आकर्षण’ बनकर रह जाने का खतरा झेल रही हैं।
संस्कृति केवल रीति-रिवाजों का संग्रह नहीं होती, वह समाज के नैतिक मूल्यों, सामूहिक स्मृति और पहचान की आत्मा होती है। हिमाचल की संस्कृति ने सदियों तक लोगों को प्रकृति के साथ संतुलन में जीना सिखाया है। लोकपरंपराएं पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाती रही हैं। जब समाज अपनी संस्कृति से दूर होता है, तो वह अनजाने में उन मूल्यों से भी दूर चला जाता है जो उसे संकटों में संभालते हैं।
आधुनिकता और संस्कृति को आमने-सामने खड़ा करना भी उचित नहीं है। समस्या आधुनिकता में नहीं, बल्कि असंतुलन में है। विकास तभी सार्थक है जब वह स्थानीय संस्कृति के साथ संवाद स्थापित करे। हिमाचल में शिक्षा संस्थानों, मीडिया और प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वे लोकभाषाओं, लोककलाओं और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षण दें। त्योहारों और मेलों को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के संस्कार निर्माण का माध्यम बनाया जाना चाहिए।
अपनी संस्कृति को जीवंत रखना किसी समाज के उत्थान का सबसे मजबूत आधार है। जो समाज अपनी जड़ों को सहेजकर आगे बढ़ता है, वही स्थायी विकास की ओर अग्रसर होता है। हिमाचल प्रदेश के लिए यह समय आत्ममंथन का है—कि आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी पहचान न खो दें। संस्कृति को बोझ नहीं, बल्कि शक्ति मानकर यदि उसे जीवन का हिस्सा बनाया जाए, तो हिमाचल न केवल विकास करेगा, बल्कि अपनी आत्मा को भी सुरक्षित रख पाएगा।

