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संपादकीय:मोबाइल मुक्त स्कूल: भविष्य सुरक्षित करने की पहल

RamParkash Vats
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Editorial Viewpoint: Brainstorming and Analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats

हिमाचल प्रदेश शिक्षा निदेशालय द्वारा स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने का एक साहसिक प्रयास है। डिजिटल युग में, जहां मोबाइल फोन को आधुनिकता और प्रगति का प्रतीक माना जाता है, वहीं विद्यालयी वातावरण में इसका अनियंत्रित प्रयोग बच्चों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा था। ऐसे समय में सरकार का यह हस्तक्षेप न केवल आवश्यक था, बल्कि देर से गया सही कदम भी कहा जा सकता है।
बीते कुछ वर्षों में स्कूलों में पढ़ाई का स्थान धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रीन ने ले लिया है। छात्र-छात्राएं ज्ञान की खोज के बजाय सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और मनोरंजन की आभासी दुनिया में अधिक समय बिता रहे हैं। इसका सीधा असर उनकी एकाग्रता, स्मरण शक्ति और मानसिक संतुलन पर पड़ा है। शिक्षक स्वयं स्वीकार करते हैं कि कक्षा में बच्चों का ध्यान बनाए रखना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है। चिंता, तनाव, चिड़चिड़ापन और नींद की कमी अब केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि शैक्षणिक समस्याएं बन चुकी हैं। ऐसे में मोबाइल पर रोक शिक्षा को बचाने का प्रयास है, न कि तकनीक से मुंह मोड़ने का।
इस निर्णय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रतिबंध केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि शिक्षकों को भी कक्षा में मोबाइल रखने से रोका गया है। अध्यापकों को कक्षा में प्रवेश से पहले मोबाइल स्टाफ रूम में रखना अनिवार्य होगा। यह प्रावधान शिक्षा की गरिमा और शिक्षक की जिम्मेदारी को पुनः स्थापित करता है। यदि शिक्षक स्वयं मोबाइल पर व्यस्त रहेंगे, तो अनुशासन और एकाग्रता की अपेक्षा बच्चों से कैसे की जा सकती है? यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि शिक्षा में अनुशासन सबके लिए समान है।
नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए शिक्षा निदेशक द्वारा औचक निरीक्षण के निर्देश स्वागतयोग्य हैं। अक्सर देखा गया है कि अच्छे निर्णय फाइलों में ही दम तोड़ देते हैं। यदि इस आदेश का पालन कड़ाई से नहीं हुआ, तो यह भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा। निरीक्षण, जवाबदेही और आवश्यकता पड़ने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई ही इस निर्णय को जमीन पर उतार सकती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी स्कूल या शिक्षक इस आदेश को हल्के में न ले।
हालांकि, इस सख्ती के साथ संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है। आपात परिस्थितियों में बच्चों और अभिभावकों के बीच संपर्क बनाए रखने की जिम्मेदारी स्कूल प्रशासन की होगी। किसी छात्र के स्वास्थ्य या पारिवारिक संकट की स्थिति में संवाद का अभाव अव्यवहारिक और अमानवीय होगा। इसलिए स्कूलों में वैकल्पिक फोन व्यवस्था और स्पष्ट दिशा-निर्देश अनिवार्य किए जाने चाहिए, ताकि प्रतिबंध अव्यवस्था का कारण न बने।
यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि मोबाइल प्रतिबंध का अर्थ तकनीक-विरोध नहीं है। शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए वीएसके एप पर ऑनलाइन अटेंडेंस की व्यवस्था जारी रहना यह दर्शाता है कि सरकार तकनीक के संतुलित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग के पक्ष में है। सवाल मोबाइल के अस्तित्व का नहीं, उसके अनुचित उपयोग का है। तकनीक शिक्षा की सहायक होनी चाहिए, शिक्षक और छात्र की जगह लेने वाली नहीं।
अन्य राज्यों और देशों के अनुभव भी इस निर्णय की पुष्टि करते हैं। फ्रांस और चीन जैसे देशों में स्कूलों में मोबाइल प्रतिबंध के बाद छात्रों की एकाग्रता और शैक्षणिक वातावरण में सुधार दर्ज किया गया है। भारत के कई निजी और आवासीय विद्यालयों ने भी मोबाइल नियंत्रण की नीति अपनाकर सकारात्मक परिणाम देखे हैं। इससे यह स्पष्ट है कि हिमाचल का कदम किसी प्रयोग का हिस्सा नहीं, बल्कि वैश्विक शैक्षणिक सोच के अनुरूप है।
अंततः यह निर्णय शिक्षा को उसकी मूल धारा—अनुशासन, एकाग्रता और ज्ञान—की ओर वापस ले जाने का प्रयास है। यदि सरकार, शिक्षा विभाग, शिक्षक और अभिभावक मिलकर इसे ईमानदारी से लागू करते हैं, तो यह कदम हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा और विश्वसनीयता देगा। लेकिन यदि इसमें ढिलाई बरती गई, तो यह भी अन्य कई फैसलों की तरह कागजों में सिमट कर रह जाएगा। शिक्षा के भविष्य को मोबाइल स्क्रीन से निकालकर कक्षा की चौखट पर लाने का यह अवसर गंवाया नहीं जाना चाहिए।

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