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कम खर्च–ज्यादा लाभ की नीति का खामियाजा: हड़ताल की कगार पर जीवनरक्षक सेवाएं

RamParkash Vats
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Shimla/25/12/2025/SBC VIjay Samyal

हिमाचल प्रदेश में सरकारी कामकाज को कम वेतन में अधिक लाभ की सोच के तहत ठेके पर देने की नीति अब जनहित पर भारी पड़ती दिख रही है। सरकार द्वारा सेवाएं सीधे संचालित करने के बजाय ठेकेदारों को सौंपने का परिणाम यह हुआ कि कर्मचारी न तो स्थायी हुए, न ही उन्हें सेवा सुरक्षा और सम्मानजनक वेतन मिल पाया। यही कारण है कि बार-बार हड़तालें होती हैं और आम जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। इसका ताजा उदाहरण 108 और 102 एम्बुलेंस सेवाओं से जुड़ा है।

प्रदेश में 108 और 102 एम्बुलेंस सेवाएं आज रात 8 बजे से 48 घंटे के लिए पूरी तरह बंद रहेंगी। एम्बुलेंस कर्मचारियों ने अपनी लंबित मांगों को लेकर हड़ताल का ऐलान किया है। इस निर्णय से राज्य की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने वैकल्पिक व्यवस्था का दावा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं अधिक चिंताजनक है।

दरअसल, सरकार ने इन एम्बुलेंस सेवाओं को ठेके पर देकर यह मान लिया कि कम खर्च में काम चल जाएगा। ठेकेदारों द्वारा रखे गए युवा कर्मचारी वर्षों से कम वेतन, अस्थायी नौकरी और अनिश्चित भविष्य के बीच काम कर रहे हैं। जीवनरक्षक सेवाओं में तैनात ये कर्मचारी दिन-रात मरीजों की जान बचाने में लगे रहते हैं, लेकिन खुद उनके जीवन की सुरक्षा और स्थिरता सरकार और कंपनियों की प्राथमिकता नहीं बन पाई।

कर्मचारियों का कहना है कि वे लंबे समय से वेतन वृद्धि, सेवा सुरक्षा और स्थायी कर्मचारी बनाए जाने की मांग कर रहे हैं। कई बार सरकार और संबंधित कंपनी को ज्ञापन सौंपे गए, बातचीत भी हुई, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला। समाधान न निकलने से मजबूर होकर अब कर्मचारियों को हड़ताल जैसा कठोर कदम उठाना पड़ा है। उनका स्पष्ट कहना है कि जब तक लिखित और ठोस आश्वासन नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

इस हड़ताल का सीधा असर सड़क दुर्घटनाओं के शिकार लोगों, गर्भवती महिलाओं, गंभीर मरीजों और अन्य आपातकालीन स्थितियों में फंसे लोगों पर पड़ेगा। विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में 108 और 102 एम्बुलेंस ही एकमात्र सहारा हैं। वहां निजी संसाधन न के बराबर हैं और समय पर एम्बुलेंस न पहुंचने की स्थिति में जान का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विभाग ने दावा किया है कि वैकल्पिक व्यवस्था कर ली गई है और जरूरत पड़ने पर सरकारी संसाधनों से मरीजों को लाया-ले जाया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था इतने बड़े स्तर पर प्रभावी साबित हो पाएगी? अतीत के अनुभव बताते हैं कि कागजी तैयारियां अक्सर जमीनी जरूरतों के सामने कमजोर पड़ जाती हैं।

असल समस्या की जड़ वही पुरानी नीति है—कम वेतन में ज्यादा काम। जब तक सरकार ठेका प्रथा पर पुनर्विचार कर जीवनरक्षक सेवाओं में कार्यरत युवाओं को स्थायी, सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार नहीं देगी, तब तक ऐसी हड़तालें होती रहेंगी। इसका नुकसान न तो ठेकेदार को होगा, न ही सिस्टम को, बल्कि आम जनता को अपनी जान की कीमत चुकानी पड़ेगी। यह समय है कि सरकार सस्ती व्यवस्था के बजाय संवेदनशील और जिम्मेदार नीति अपनाए, ताकि जीवन बचाने वाली सेवाएं खुद जीवन के संघर्ष में न उलझें।

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