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नेत्रदान बनी परंपरा, 272वां नेत्रदान कर रचा गया मानवता का उदाहरण

RamParkash Vats
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नेत्रदान बने परंपरा, यह संदेश हमारा हैयह केवल एक नारा नहीं, बल्कि सीतापुर जनपद में वर्षों से चल रही एक ऐसी सामाजिक मुहिम है, जिसने सैकड़ों नेत्रहीनों के जीवन में रोशनी लौटाई है। सक्षम संस्था द्वारा बोया गया नेत्रदान का यह बीज आज एक विशाल और सशक्त वृक्ष का रूप ले चुका है, जिसकी छांव में मानवता, करुणा और परोपकार की अनगिनत कहानियां जन्म ले रही हैं। इसी कड़ी में बिसवां नगर से एक और प्रेरक उदाहरण सामने आया, जहां 62 वर्षीय अन्नपूर्णा अग्रवाल के निधन के उपरांत उनके परिजनों ने 272वां नेत्रदान कर समाज के सामने मानवता की अनुपम मिसाल पेश की।

शोक से सेवा तक का सफर

अन्नपूर्णा अग्रवाल, पत्नी स्वर्गीय अशोक कुमार अग्रवाल, बिसवां नगर की एक सम्मानित और सरल व्यक्तित्व वाली महिला थीं। उनके निधन से परिवार और समाज में शोक की लहर दौड़ गई। आमतौर पर ऐसे क्षणों में परिवारजन गहरे दुख और भावनात्मक पीड़ा से गुजरते हैं, लेकिन इसी पीड़ा के बीच उनके पुत्र अनुराग अग्रवाल, अनुपम अग्रवाल एवं पुत्री आरती अग्रवाल ने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने न केवल उनके स्वजन की स्मृति को अमर बना दिया, बल्कि दो नेत्रहीन व्यक्तियों के जीवन में नई सुबह की शुरुआत कर दी।परिजनों ने सक्षम संस्था से संपर्क कर नेत्रदान की इच्छा जताई। यह निर्णय आसान नहीं था, किंतु उन्होंने मानवीय संवेदना और समाजहित को प्राथमिकता देते हुए इसे अंतिम सेवा के रूप में स्वीकार किया। परिजनों का कहना था कि “यदि मां के जाने के बाद भी किसी के जीवन में उजाला आ सकता है, तो इससे बड़ा सुकून और क्या हो सकता है।”

रात्रि में तत्परता की मिसाल

सक्षम संस्था के जिला मीडिया प्रभारी विकास अग्रवाल ने जानकारी देते हुए बताया कि बिसवां के समाजसेवी अमरनाथ मल्होत्रा द्वारा रात्रि लगभग 12 बजे नेत्रदान की सूचना दी गई। सूचना मिलते ही आंख अस्पताल सीतापुर की टीम ने बिना विलंब किए आवश्यक तैयारियां पूरी कीं और तत्काल बिसवां स्थित निवास पर पहुंची।टीम में अरुणेश मिश्रा, डॉ. श्रुति सक्सैना, डॉ. नीलम कुमारी एवं प्रिया शामिल रहीं। पूरी प्रक्रिया को अत्यंत सावधानी, सम्मान और चिकित्सा मानकों के अनुरूप संपन्न किया गया। एक छोटे से ऑपरेशन के माध्यम से नेत्रों को सुरक्षित निकाला गया और तत्पश्चात उन्हें आई बैंक सीतापुर में संरक्षित किया गया। चिकित्सकों के अनुसार, इन नेत्रों का प्रत्यारोपण दो ऐसे नेत्रहीन व्यक्तियों में किया जाएगा, जो लंबे समय से रोशनी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

दो जिंदगियों में लौटेगा उजाला

नेत्रदान का महत्व केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी व्यक्ति के जीवन को फिर से अर्थ देने का माध्यम है। जिन दो नेत्रहीन व्यक्तियों को ये नेत्र प्रत्यारोपित किए जाएंगे, उनके लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। वर्षों से अंधकार में जीवन जी रहे ये लोग अब अपने परिवार, अपने बच्चों और इस रंगीन दुनिया को देखने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे।चिकित्सकों का कहना है कि एक सफल नेत्रदान और प्रत्यारोपण न केवल दृष्टि लौटाता है, बल्कि आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और जीवन के प्रति आशा को भी पुनर्जीवित करता है। यही कारण है कि नेत्रदान को “महादान” की संज्ञा दी जाती है।

संस्था की भूमिका और सामाजिक प्रतिबद्धता

सक्षम संस्था ने सीतापुर जनपद में नेत्रदान को एक जनआंदोलन का रूप दिया है। संस्था के महामंत्री मुकेश अग्रवाल ने इस अवसर पर शोक की घड़ी में भी परिजनों द्वारा किए गए इस महान कार्य के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “परोपकार की भावना से किया गया यह दान सर्वश्रेष्ठ दान है। नेत्रदान न केवल नेत्रहीनों के जीवन में रोशनी लाता है, बल्कि समाज को संवेदनशील और मानवीय बनाता है।”संस्था अध्यक्ष संदीप भरतिया ने कहा कि नेत्रदान ऐसा उपहार है, जो व्यक्ति की अनुपस्थिति में भी किसी और के जीवन में रंग भर देता है। यह मृत्यु के बाद भी जीवन को सार्थक बना देता है। उन्होंने कहा कि सक्षम संस्था का उद्देश्य केवल नेत्रदान कराना नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाना है, ताकि लोग जीवन रहते ही इस पुण्य कार्य के लिए संकल्प ले सकें।

धन्य हैं वे लोग

संस्था के वरिष्ठ सदस्य सुभाष अग्निहोत्री ने भावुक शब्दों में कहा, “किसी के जीवन में रोशनी लौटाना अमूल्य तोहफा है। धन्य हैं वे लोग, जो जाते-जाते अपने नेत्रों का दान कर जाते हैं। यह ऐसा दान है, जिसका मूल्य किसी भी धन-संपत्ति से नहीं आंका जा सकता।”उन्होंने बताया कि नेत्रदान को लेकर समाज में अभी भी कई भ्रांतियां हैं, जिन्हें दूर करना आवश्यक है। सही जानकारी और प्रेरणा से ही लोग इस महादान के लिए आगे आएंगे।

272वां नेत्रदान: एक ऐतिहासिक पड़ाव

अक्षत अग्रवाल ने जानकारी दी कि सक्षम संस्था द्वारा अब तक 272वां नेत्रदान संपन्न कराया जा चुका है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं, बल्कि संस्था की निरंतर सामाजिक प्रतिबद्धता, अथक प्रयासों और जनसहयोग का प्रमाण है। हर नेत्रदान के पीछे एक परिवार की संवेदना, एक संस्था की मेहनत और दो व्यक्तियों की नई शुरुआत छिपी होती है।संस्था के कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनका लक्ष्य आने वाले वर्षों में इस संख्या को और अधिक बढ़ाना है, ताकि कोई भी व्यक्ति केवल दृष्टि के अभाव में जीवन की मुख्यधारा से वंचित न रहे।

समाज में बढ़ती जागरूकता

सीतापुर जनपद में नेत्रदान को लेकर जागरूकता लगातार बढ़ रही है। पहले जहां लोग इस विषय पर संकोच करते थे, वहीं अब इसे गर्व और सेवा का विषय माना जाने लगा है। सामाजिक संस्थाएं, चिकित्सक, मीडिया और जागरूक नागरिक मिलकर इस मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं।बिसवां जैसे छोटे नगरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक, नेत्रदान की चर्चा अब आम होने लगी है। लोग अपने परिवारजनों से इस विषय पर बात कर रहे हैं और जीवन रहते ही नेत्रदान का संकल्प ले रहे हैं।

मीडिया और समाजसेवियों की भूमिका

इस पूरे अभियान में समाजसेवियों और मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। समाजसेवी अमरनाथ मल्होत्रा जैसे लोग समय पर सूचना देकर और परिवारों को प्रेरित कर इस प्रक्रिया को सुचारू बनाते हैं। वहीं स्थानीय मीडिया ने नेत्रदान की कहानियों को प्रमुखता से प्रकाशित कर समाज में सकारात्मक संदेश फैलाया है।भविष्य की दिशासक्षम संस्था का मानना है कि यदि प्रत्येक परिवार नेत्रदान के महत्व को समझ ले, तो नेत्रहीनता जैसी समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए निरंतर जागरूकता अभियान, शिविर, सेमिनार और जनसंवाद आवश्यक हैं।संस्था आने वाले समय में स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक मंचों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रही है, ताकि युवा पीढ़ी को इस महादान के प्रति प्रेरित किया जा सके।

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