Reading: “हिमाचल पर बढ़ता कंक्रीट, गगनचुंबी विकास की अंधी दौड़ और भूकंपीय संवेदनशील पहाड़ों पर मंडराता विनाश का साया”

“हिमाचल पर बढ़ता कंक्रीट, गगनचुंबी विकास की अंधी दौड़ और भूकंपीय संवेदनशील पहाड़ों पर मंडराता विनाश का साया”

RamParkash Vats
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Editorial Viewpoint: Brainstorming and Analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats

पहाड़ों की गोद में बसा हिमाचल प्रदेश अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत जीवन और संतुलित पारिस्थितिकी के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन बीते दो दशकों में विकास की जिस अंधी दौड़ ने प्रदेश को जकड़ा है, उसने पहाड़ों के स्वाभाविक चरित्र को गहरे संकट में डाल दिया है। “हिमाचल पर बढ़ता कंक्रीट, भूकंप को खुला निमंत्रण” अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि कड़वी सच्चाई बनता जा रहा है। बहुमंजिला इमारतें, अनियंत्रित होटल, सड़कों के नाम पर पहाड़ों की बेरहमी से कटाई—यह सब उस धरती पर हो रहा है जो स्वयं भूकंपीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। सवाल यह नहीं कि भूकंप कब आएगा, सवाल यह है कि जब आएगा, तब यह कंक्रीट का बोझ कितनी जिंदगियां निगल जाएगा।

हिमाचल का अधिकांश हिस्सा भूकंपीय जोन-4 और जोन-5 में आता है, जहां हल्की सी भी भू-आकृतिक छेड़छाड़ बड़े विनाश का कारण बन सकती है। इसके बावजूद शिमला, मनाली, धर्मशाला और अन्य कस्बों में गगनचुंबी इमारतों की होड़ लगी हुई है। “गगनचुंबी बोझ, कांपता हिमाचल” इस स्थिति का सटीक चित्रण करता है। पहाड़ों की ढलानों पर बिना वैज्ञानिक अध्ययन के डाली जा रही नींव, नालों और जलधाराओं को पाटकर खड़ा किया गया कंक्रीट, और भवन निर्माण नियमों की खुलेआम अनदेखी—ये सभी भूकंप के खतरे को कई गुना बढ़ा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि विकास के नाम पर हम उसी जमीन को कमजोर कर रहे हैं, जिस पर हमारा अस्तित्व टिका है।

संपादकीय दृष्टि से देखें तो यह केवल प्राकृतिक आपदा का प्रश्न नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता और सामाजिक लापरवाही का परिणाम है। प्रशासनिक तंत्र अक्सर राजस्व और निवेश के दबाव में नियमों को नरम कर देता है, जबकि स्थानीय निकाय आंख मूंदकर नक्शों की मंजूरी दे देते हैं। “पहाड़ों पर कंक्रीट का बोझ, बढ़ता भूकंप का ख़तरा” एक चेतावनी है कि यदि समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो नुकसान अपूरणीय होगा। दुर्भाग्य यह है कि हर आपदा के बाद जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्टें आती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं होता। न तो निर्माण की ऊंचाई पर सख्ती है, न ही पारंपरिक और भूकंप-रोधी वास्तुकला को प्रोत्साहन।

अंततः यह मानना होगा कि भूकंप दुश्मन नहीं है; दुश्मन है हमारी अदूरदर्शिता। “भूकंप नहीं बुलाता, हम बुलाते हैं”—यह पंक्ति हिमाचल के वर्तमान विकास मॉडल पर सबसे तीखा व्यंग्य है। जरूरत है ऐसी विकास नीति की जो पहाड़ों की वहन क्षमता को समझे, स्थानीय भूगोल के अनुरूप निर्माण को बढ़ावा दे और कंक्रीट के बजाय प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का रास्ता चुने। यदि आज हमने दिशा नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ियां हमें विकास नहीं, विनाश के सौदागर के रूप में याद करेंगी। हिमाचल को बचाना है, तो कंक्रीट की ऊंचाई नहीं, सोच की ऊंचाई बढ़ानी होगी।

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