हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक सुंदरता जितनी मनोहारी है, उसकी भूकंपीय संवेदनशीलता उतनी ही गंभीर और चिंताजनक। हिमालयी राज्य होने के कारण हिमाचल प्रदेश भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में शुमार है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रदेश मुख्यतः भूकंपीय जोन–IV और जोन–V में आता है, जिन्हें उच्च तथा अति उच्च जोखिम श्रेणी माना जाता है। यह स्थिति केवल एक तकनीकी वर्गीकरण नहीं, बल्कि भविष्य के संभावित विनाश की स्पष्ट चेतावनी है।

“भूकंप के ऊपर, हिमाचल के ऊपर—बढ़ता कंक्रीट और गगनचुंबी बोझ”
हिमाचल की भूकंपीय संवेदनशीलता का मूल कारण इसकी टेक्टोनिक प्लेटों की स्थिति है। यह राज्य भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव क्षेत्र पर स्थित है। भारतीय प्लेट निरंतर उत्तर दिशा की ओर खिसक रही है, जिससे हिमालय क्षेत्र में भारी दबाव और तनाव जमा होता रहता है। यही संचित टेक्टोनिक ऊर्जा समय-समय पर भूकंप के रूप में बाहर निकलती है, जिससे यह इलाका लगातार सक्रिय बना रहता है।
अति संवेदनशील जिले (Zone V) की बात करें तो कांगड़ा, चंबा, मंडी, कुल्लू, किन्नौर और लाहौल–स्पीति के बड़े हिस्से इस श्रेणी में आते हैं। इन क्षेत्रों में MSK पैमाने पर IX या उससे अधिक तीव्रता के झटकों की आशंका मानी जाती है। इतिहास इसकी गवाही देता है—1905 का कांगड़ा भूकंप, जिसकी तीव्रता लगभग 7.8 थी, ने 20 हजार से अधिक लोगों की जान ले ली थी। यह त्रासदी आज भी याद दिलाती है कि हिमाचल में भूकंप कोई संभावना नहीं, बल्कि एक निश्चित खतरा है।
उच्च जोखिम (Zone IV) में आने वाले जिलों—बिलासपुर, सोलन और सिरमौर के कई हिस्से—भी कम चिंताजनक नहीं हैं। यहां भले ही तीव्रता अपेक्षाकृत कम मानी जाती हो, लेकिन अनियोजित निर्माण, पहाड़ी ढलानों पर बढ़ता शहरीकरण और कमजोर बुनियादी ढांचा जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
चंबा, मंडी, कुल्लू, किन्नौर और लाहौल–स्पीति जैसे दुर्गम और जनजातीय जिलों में स्थिति और भी गंभीर है। एक ओर ये क्षेत्र लगातार भूकंपीय गतिविधियों के केंद्र रहे हैं, दूसरी ओर राहत और बचाव तंत्र की सीमाएं यहां किसी भी आपदा को विकराल बना सकती हैं। संकरी घाटियां, कमजोर सड़क नेटवर्क और पारंपरिक निर्माण शैली, बड़े भूकंप की स्थिति में भारी नुकसान का संकेत देती हैं।
वैज्ञानिक जिस भूकंपीय ‘गैप’ की ओर संकेत कर रहे हैं, वह चिंता को और गहरा करता है। लंबे समय से बड़े भूकंप न आने का अर्थ यह नहीं कि खतरा टल गया है, बल्कि यह कि भारी मात्रा में ऊर्जा भीतर ही भीतर जमा हो रही है। हाल के वर्षों में लगातार आ रहे छोटे–मोटे झटके इसी संचित तनाव के संकेत हैं, जो भविष्य में किसी बड़े और विनाशकारी भूकंप का कारण बन सकते हैं।
हालिया आकलनों और मसौदा चर्चाओं में यह बात उभरकर सामने आई है कि हिमालयी राज्यों, विशेषकर हिमाचल, को एकीकृत उच्चतम जोखिम दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। यद्यपि आधिकारिक रूप से भारत में जोन–II से जोन–V तक का ही वर्गीकरण है, फिर भी विशेषज्ञ यह मानते हैं कि हिमाचल के सभी जिले व्यवहारिक रूप से उच्च जोखिम श्रेणी में ही आते हैं। यह संकेत नीति–निर्माताओं के लिए स्पष्ट है कि अब आधे–अधूरे उपायों से काम नहीं चलेगा।
संपादकीय दृष्टि से सारगर्भित है किहिमाचल प्रदेश का कोई भी जिला भूकंप के खतरे से अछूता नहीं है, लेकिन कांगड़ा, चंबा, मंडी, कुल्लू, किन्नौर और लाहौल–स्पीति अति संवेदनशील श्रेणी में विशेष सतर्कता की मांग करते हैं। आवश्यकता है सख्त भवन संहिता के पालन, भूकंप–रोधी निर्माण, जन–जागरूकता और आपदा प्रबंधन तंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की। क्यों

