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राजकीय महाविद्यालय रोनहाट को बंद करना: पहाड़ की बेटियों के सपनों पर प्रहार

RamParkash Vats
3 Min Read

Sirmour/DCB

किसी भी समाज की रीढ़ शिक्षा होती है। और जब बात दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों की हो, तो वहाँ का एक महाविद्यालय केवल ईंट-गारे की इमारत नहीं होता। वह हजारों परिवारों की उम्मीद, सैकड़ों बेटियों का हौसला और पूरे क्षेत्र के भविष्य की नींव होता है। ऐसे में राजकीय महाविद्यालय रोनहाट को बंद करने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि पहाड़ की बेटियों के सपनों पर सीधा प्रहार है।

रोनहाट और इसके आसपास का क्षेत्र भौगोलिक रूप से बेहद कठिन है। यहाँ से शिमला, सोलन या नाहन जैसे शहरों तक पहुँचना हर विद्यार्थी के बस की बात नहीं। अधिकांश परिवारों की आर्थिक स्थिति सामान्य है। बसों की कमी, खराब सड़कें और दूरियाँ मिलकर उच्च शिक्षा को एक सपना बना देती हैं। ऐसे में रोनहाट महाविद्यालय उन युवाओं के लिए एकमात्र आशा की किरण था, जो आर्थिक या भौगोलिक मजबूरी में बाहर नहीं जा सकते।

इस महाविद्यालय की सबसे बड़ी ताकत इसकी छात्राएँ हैं। पहाड़ में आज भी कई माता-पिता सुरक्षा, दूरी और खर्च के डर से बेटियों को शहर भेजने से हिचकते हैं। रोनहाट कॉलेज ने उन घरों की देहरी लाँघकर बेटियों को डिग्री तक पहुँचाया। यदि यह महाविद्यालय बंद हुआ, तो सैकड़ों लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाएगी।

यह सीधा-सीधा “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के नारे के विपरीत है।

सरकार अक्सर कहती है कि छात्र संख्या कम है, इसलिए कॉलेज चलाना घाटे का सौदा है। पर पहाड़ को मैदान के पैमाने से नहीं मापा जा सकता। यहाँ 50 बच्चे भी 500 के बराबर हैं, क्योंकि हर एक बच्चे के पीछे 5-6 किलोमीटर पैदल चलने की मजबूरी, बरसात में बंद रास्ते और माँ-बाप का टूटता भरोसा जुड़ा है।

एक कॉलेज बंद होने से केवल कक्षाएँ बंद नहीं होंगी। पलायन बढ़ेगा, बेरोजगारी बढ़ेगी, बाल विवाह का खतरा बढ़ेगा और पहाड़ और खाली होंगे। शिक्षा पर खर्च बोझ नहीं, निवेश होता है।क्षेत्र की जनता, अभिभावक और छात्र-छात्राएँ सरकार से हाथ जोड़कर एक ही माँग कर रहे हैं: इस निर्णय पर पुनर्विचार हो। कॉलेज को बंद नहीं, और मजबूत किया जाए। यहाँ शिक्षकों के पद भरे जाएँ, नए विषय शुरू किए जाएँ।

एक महाविद्यालय बचाने का अर्थ है सैकड़ों बेटियों के सपनों को बचाना, हजारों परिवारों की उम्मीद को बचाना और पूरे ट्रांसगिरि क्षेत्र के भविष्य को बचाना।क्योंकि जब पहाड़ से कॉलेज उजड़ते हैं, तो सिर्फ इमारतें नहीं गिरतीं, पीढ़ियों के सपने गिरते हैं।

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