हिमाचल के हितों की अनदेखी क्यों?

Editorial Viewpoint: Brainstorming and analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats
हिमाचल प्रदेश एक ऐसा पर्वतीय राज्य है, जिसने देश के विकास में जल, बिजली और भूमि के रूप में भारी योगदान दिया है। भाखड़ा, पौंग, कोलडैम, नाथपा-झाकड़ी जैसी बड़ी परियोजनाओं ने उत्तर भारत को ऊर्जा और सिंचाई का संबल दिया, लेकिन बदले में हिमाचल को आज भी विस्थापन, अधूरी पुनर्वास नीतियों और पर्यावरणीय क्षति का बोझ उठाना पड़ रहा है। ऐसे में टौंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना को लेकर प्रदेश सरकार का सख्त रुख न केवल तार्किक है, बल्कि हिमाचल के दीर्घकालिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक भी है।
प्रदेश सरकार ने गृह मंत्रालय को स्पष्ट कर दिया है कि किशाऊ बांध एवं जलविद्युत परियोजना के लिए वह किसी भी प्रकार का वित्तीय भार वहन नहीं करेगी। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में सरकार का यह रुख भावनात्मक नहीं, बल्कि पिछले अनुभवों और गहन अध्ययन पर आधारित है। यह वही हिमाचल है, जिसने पूर्व की बांध परियोजनाओं में अपनी जमीन, जंगल और लोगों की कुर्बानी दी, लेकिन आज भी भाखड़ा और पौंग विस्थापित न्याय की प्रतीक्षा में हैं।
विस्थापन और जलमग्न भूमि का कड़वा सच
किशाऊ बांध परियोजना से सिरमौर जिले सहित सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा। खेती योग्य भूमि जलमग्न होगी, गांव उजड़ेंगे और स्थानीय लोगों की आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा। यह कटु सत्य है कि परियोजना से मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ हिमाचल को सीमित हैं, जबकि सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान कहीं अधिक हैं। ऐसे में यदि प्रदेश सरकार यह कहती है कि बिना पर्याप्त लाभ के वह 1536 करोड़ रुपये का भार क्यों उठाए, तो इसमें कोई असंगति नहीं है।
90:10 का फार्मूला हिमाचल के लिए अन्यायपूर्ण
केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 90:10 खर्च अनुपात में हिमाचल और उत्तराखंड को कुल 1536 करोड़ रुपये का आधा-आधा भार उठाना था। लेकिन सवाल यह है कि जब परियोजना से हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को सिंचाई और पेयजल का बड़ा लाभ मिलेगा, तो आर्थिक बोझ केवल दो पर्वतीय राज्यों पर क्यों डाला जाए? हिमाचल सरकार का यह कहना बिल्कुल उचित है कि केंद्र सरकार को न केवल 90 प्रतिशत, बल्कि हिमाचल के हिस्से का खर्च भी वहन करना चाहिए।
भाखड़ा और पौंग: अधूरे वादों की याद
प्रदेश सरकार ने अपर यमुना बोर्ड की बैठक में यह मुद्दा भी मजबूती से उठाया कि बीबीएमबी का 2011 से पहले का बकाया एरियर आज तक नहीं मिला है। इससे भी अधिक गंभीर मसला है भाखड़ा और पौंग विस्थापितों का, जिनकी पीड़ा छह दशक बाद भी जस की तस है। पुनर्वास के अधूरे वादे और बुनियादी सुविधाओं का अभाव यह बताने के लिए काफी है कि बड़ी परियोजनाओं का असली बोझ कौन उठाता है। जब पुराने जख्म अभी भरे नहीं, तो नई परियोजनाओं का भार उठाने की अपेक्षा करना हिमाचल के साथ अन्याय ही होगा।
पर्यावरणीय संतुलन भी बड़ा सवाल
हिमाचल जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में बड़े बांध केवल विकास का साधन नहीं, बल्कि संभावित आपदा का कारण भी बन सकते हैं। भूस्खलन, भूकंपीय जोखिम और जैव विविधता पर असर ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रदेश सरकार का यह कहना कि अध्ययन के बाद उसे परियोजना से अधिक नुकसान और कम लाभ दिखता है, एक जिम्मेदार सरकार की पहचान है।
केंद्र से सहयोग, टकराव नहीं
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हिमाचल सरकार का रुख केंद्र विरोधी नहीं, बल्कि न्यायोचित सहयोग की मांग है। यदि किशाऊ बांध राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है, तो उसका वित्तीय और सामाजिक दायित्व भी केंद्र सरकार को ही उठाना चाहिए। हिमाचल विकास के खिलाफ नहीं है, लेकिन अपने लोगों, अपनी जमीन और अपने पर्यावरण की कीमत पर नहीं।
अंततः सवाल यही है कि क्या हिमाचल केवल संसाधन देने वाला राज्य बना रहेगा, या उसके हितों और अधिकारों को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाएगा? किशाऊ बांध पर प्रदेश सरकार का रुख इस बात का संकेत है कि अब हिमाचल चुप नहीं रहेगा। यह रुख न केवल उचित है, बल्कि समय की मांग भी।

