हिमाचल प्रदेश में फिजिकल शिक्षकों की हालत आज उस आईने की तरह है, जिसमें राज्य की रोजगार नीति, राजनीतिक इच्छाशक्ति और वित्तीय प्रबंधन की वास्तविक तस्वीर साफ दिखाई देती है। वर्षों की पढ़ाई, प्रशिक्षण और उम्मीदों के बावजूद ये शिक्षक आज दरबदर की ठोकरें खा रहे हैं। यह केवल किसी एक वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि उस नीतिगत विफलता का परिणाम है, जिसके लिए भाजपा और कांग्रेस—दोनों ही दल अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।
बीते दो दशकों में स्थायी नौकरियों का जो ढांचा था, उसे धीरे-धीरे ठेकेदारी और आउटसोर्सिंग ने निगल लिया। जिसे “आर्थिक मजबूरी” बताया गया, वही आज बेरोजगार युवाओं के लिए काल बन चुकी है। ठेकेदारी प्रथा ने न केवल रोजगार की सुरक्षा छीनी, बल्कि सम्मानजनक भविष्य की संभावना भी छीन ली। फिजिकल शिक्षक इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं—जिनकी जरूरत हर स्कूल में है, लेकिन जिनके लिए स्थायी पद खोलने से सरकारें कतराती रही हैं।
राजनीतिक दल हर पांच साल में एक ही राग अलापते हैं—“प्रदेश का खजाना खाली है।” यह तर्क सुनते-सुनते 1971 से 2025 तक का लंबा सफर तय हो गया, लेकिन सवाल वही है: जब सत्ता की डोर लगातार भाजपा और कांग्रेस के हाथों में रही, तो खजाना भरने की ठोस नीति क्यों नहीं बनी? हर साल कर्ज घटने के बजाय दोगुना होता गया और इसका सबसे भयावह असर रोजगार पर पड़ा। यह स्थिति उस तर्क जैसी है, मानो डूबती नाव का वजन घटाने के लिए सिर के बाल उतार दिए जाएं—मूल समस्या जस की तस बनी रहती है।आज हालत यह है कि स्थायी नौकरियों के रास्ते लगभग बंद होने के कगार पर हैं। उदाहरण के लिए एक स्थायी कर्मचारी पर औसतन 40 हजार रुपये मासिक का बोझ पड़ता है, जबकि उसी रकम में आउटसोर्सिंग के जरिए चार लोग रखे जा सकते हैं। यह गणित कागज पर भले सही लगे, लेकिन इसका सामाजिक और मानवीय मूल्य कौन चुकाएगा? यदि प्रशिक्षित बेरोजगारों को कॉन्ट्रैक्ट बेस पर ही सही, पारदर्शी और सम्मानजनक शर्तों पर रखा जाए, तो यह बेरोजगारों के प्रति कम से कम एक सराहनीय कदम हो सकता है। मगर वर्तमान व्यवस्था में न सुरक्षा है, न भविष्य।
बैचवाइज भर्ती, जो कभी फिजिकल शिक्षकों के लिए उम्मीद की किरण थी, आज लगभग समाप्ति की ओर है। वर्ष 2000 के बाद यह प्रक्रिया कछुआ चाल से चली और 2002 के बाद तो नाममात्र रह गई। 2004 से फिजिकल एजुकेशन उत्तीर्ण करने वाले आज भी नौकरी का इंतजार कर रहे हैं। कई की आयु सीमा भी पार हो चुकी है। यही स्थिति लाइब्रेरियन शिक्षकों की है। सवाल यह है कि 2025 के प्रशिक्षित युवाओं का क्या होगा? सरकारों ने कभी संतुलन बनाने का ईमानदार प्रयास नहीं किया।विडंबना यह भी है कि जब कभी नौकरियां निकाली जाती हैं, तो वे इस ढंग से कि विवाद खड़ा हो जाए। विवाद अदालत तक पहुंचता है और पांच-सात साल यूं ही निकल जाते हैं। स्टाफ नर्सों की भर्तियों में आयु सीमा को लेकर हुआ विवाद इसका ताजा उदाहरण है। फिजिकल शिक्षकों के मामले में भी जब नौकरियां मिलेगी तब अभ्यर्थियों की उम्र 40 के आसपास पहुंच चुकी होगी
—यानी जवानी इंतजार में ही बीत गई।
हिमाचल प्रदेश के हितों के परिप्रेक्ष्य में देशव्यापी संदर्भ
हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे और संसाधन-सीमित पहाड़ी राज्य में बेरोज़गारी केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि संवैधानिक और प्रशासनिक विफलता का भी संकेत बनती जा रही है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि यहां के बेरोज़गार युवाओं को अपने हक़ के रोज़गार के लिए बार-बार न्यायालयों का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है। चयन प्रक्रियाओं में देरी, नियमों की अस्पष्टता, नीतियों का बार-बार बदलना और अदालतों के आदेशों के बावजूद उनके क्रियान्वयन में ढिलाई—ये सभी कारण सरकारों और विभागों को कानून के कठघरे में खड़ा कर देते हैं। जब नीति-निर्माण और प्रशासनिक निर्णय संविधान, सेवा नियमों और न्यायिक निर्देशों के अनुरूप नहीं होते, तब बेरोज़गार युवा मजबूरन कानूनी लड़ाई लड़ते हैं। यह स्थिति न केवल युवाओं के समय और संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि शासन व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार से अपेक्षित विशेष आर्थिक सहयोग का अभाव भी हिमाचल की चुनौतियों को और गहरा करता है। पहाड़ी भूगोल, सीमित औद्योगिक आधार और आपदा-संवेदनशीलता को देखते हुए प्रदेश को अतिरिक्त वित्तीय सहायता और दीर्घकालिक पैकेज की आवश्यकता है, लेकिन अक्सर केंद्र-राज्य संबंध राजनीतिक खींचतान में उलझ जाते हैं। इस राजनीतिक झमेले का सीधा असर प्रदेश की जनता पर पड़ता है—विकास परियोजनाएं धीमी पड़ती हैं, रोज़गार सृजन रुकता है और सामाजिक सेवाओं पर दबाव बढ़ता है। हिमाचल के हित में यह आवश्यक है कि केंद्र और राज्य, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर, आर्थिक सुदृढ़ीकरण, रोज़गार सृजन और प्रशासनिक पारदर्शिता को प्राथमिकता दें, ताकि प्रदेश की जनता को अदालती लड़ाइयों और राजनीतिक टकराव की कीमत न चुकानी पड़े।
संपादकीय दृष्टिकोण से अब समय आ गया है कि भाजपा और कांग्रेस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठें। प्रदेश पर बढ़ते कर्ज, रोजगार संकट और शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों पर एक मंच पर आकर गंभीर चिंतन, मंथन और विश्लेषण करें। यह केवल वित्तीय आंकड़ों का नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के भरोसे का सवाल है। यदि आज भी स्थायी और संतुलित रोजगार नीति नहीं बनी, तो फिजिकल शिक्षकों की पीड़ा कल किसी और वर्ग की कहानी बन जाएगी। हिमाचल को खोखले बहानों की नहीं, साहसिक फैसलों की जरूरत है।

