संपादकीय लेख: संपादक राम प्रकाश वत्स
समय की अवश्यकता और जनहित में जरूरी है । स्नेक बाईट के बाद समय कम होता है जीवन को बचाने के लिए
हिमाचल प्रदेश अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जैव विविधता और शांत जीवनशैली के लिए जाना जाता है, लेकिन इसी प्रकृति के बीच एक गंभीर और अक्सर उपेक्षित खतरा भी छिपा है—जहरीले सांपों का बढ़ता प्रकोप। प्रदेश के अनेक जिलों, विशेषकर निचले और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में सांप काटने की घटनाएँ हर वर्ष सामने आती हैं। दुखद तथ्य यह है कि इनमें से कई घटनाएँ समय पर इलाज न मिलने के कारण मौत में बदल जाती हैं। यह स्थिति केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का संकेत भी है।
बरसात के मौसम में खेतों, झाड़ियों और रिहायशी इलाकों में सांपों की सक्रियता बढ़ जाती है। किसान, मजदूर, चरवाहे और ग्रामीण महिलाएँ सबसे अधिक इसकी चपेट में आते हैं। प्रदेश के दूरदराज़ क्षेत्रों में आज भी सांप काटने के बाद झाड़-फूंक, तांत्रिक और घरेलू उपायों का सहारा लिया जाता है, जिससे कीमती समय नष्ट होता है। जब तक पीड़ित को किसी बड़े अस्पताल तक पहुँचाया जाता है, तब तक ज़हर शरीर में घातक स्तर तक फैल चुका होता है।
सांप के जहर का इलाज पूरी तरह समय पर एंटी-स्नेक वेनम मिलने पर निर्भर करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पहले एक से दो घंटे “स्वर्णिम समय” होते हैं। लेकिन हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में यह समय अक्सर सड़कों की दूरी, संसाधनों की कमी और रेफरल प्रणाली की जटिलताओं में ही समाप्त हो जाता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में न तो पर्याप्त मात्रा में एंटी-स्नेक वेनम उपलब्ध रहता है और न ही प्रशिक्षित स्टाफ या वेंटिलेटर जैसी सुविधाएँ।
यह विडंबना ही है कि जिस राज्य में आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य ढांचे पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, वहाँ स्नेक बाइट जैसी जानलेवा आपदा के लिए कोई समर्पित व्यवस्था नहीं है। इसे अब एक आकस्मिक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है।
समय की मांग है कि हिमाचल प्रदेश के प्रत्येक उपमंडल स्तर पर ‘स्पेशल स्नेक बाइट यूनिट’ स्थापित किए जाएँ। इन केंद्रों में 24×7 चिकित्सक, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, पर्याप्त एंटी-स्नेक वेनम, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर और त्वरित एंबुलेंस सुविधा अनिवार्य हो। साथ ही, स्वास्थ्य कर्मियों को नियमित रूप से स्नेक बाइट प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण दिया जाए।
इसके समानांतर, ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान भी चलाए जाने चाहिए, ताकि लोग अंधविश्वास छोड़कर तुरंत अस्पताल पहुँचें। स्कूलों, पंचायतों और किसान सभाओं में प्राथमिक उपचार की जानकारी देना भी जीवनरक्षक सिद्ध हो सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही स्नेक बाइट को एक उपेक्षित लेकिन घातक बीमारी मान चुका है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह इस खतरे को गंभीरता से ले और ठोस नीति बनाए। हर एक बचाई गई जान सरकार की संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता का प्रमाण होगी।
अब सवाल यह नहीं कि व्यवस्था बने या नहीं, बल्कि यह है कि कब बनेगी। यदि आज भी देरी की गई, तो हर अगली मौत हमारी सामूहिक लापरवाही का आरोप बनकर खड़ी होगी

