JAWALI/13 DEC 2025/REPORTER DR. NAVNEET SHARMA
कथावाचक श्री रघुनंदन सारस्वत जी प्रवचनों की अमृत रस धारा प्रवाहित करते हुए कहा कि उपस्थित श्रोतागण जब सृष्टि में अधर्म, अत्याचार और दैत्य शक्तियों का अत्यधिक बढ़ाव हो गया, तब देवता असहाय होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे। दैत्यों के आतंक से यज्ञ, तप, वेद-पाठ और धर्म कर्म बाधित होने लगे थे। उस समय त्रिदेवों की तेजस्वी शक्तियों से एक महाशक्ति का प्राकट्य हुआ, जिसे ही मां जगदम्बा कहा गया।शास्त्रों के अनुसार यह शक्ति आदि शक्ति, महादेवी और दुर्गा के रूप में प्रकट हुई। देवी का अवतरण धर्म की रक्षा, भक्तों के कल्याण और अधर्म के विनाश के लिए हुआ। उन्होंने महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ और चण्ड-मुण्ड जैसे दैत्यों का संहार कर देवताओं को भयमुक्त किया।
कथावाचक श्री रघुनंदन सारस्वत जीने कहा कि मां जगदम्बा केवल एक देवी नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना हैं। सृष्टि का संचालन उन्हीं की शक्ति से होता है—वे ही सृष्टि, स्थिति और संहार की मूल कारण हैं। जब-जब धरती पर धर्म संकट में पड़ता है, तब-तब मां अपने विभिन्न स्वरूपों में अवतरित होकर संतुलन स्थापित करती हैं।उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि देवी की भक्ति से मन, परिवार और समाज में शांति आती है, और सनातन धर्म की रक्षा के लिए देवी उपासना का विशेष महत्व है।
मां जगदम्बा का सिमरण और श्रद्धा–सीमा की कथा
कथावाचक श्री रघुनंदन सारस्वत जी प्रवचनों की अमृत रस धारा प्रवाहित करते हुए कहा कि उपस्थित श्रोतागण मां जगदम्बा का सच्चे मन से सिमरण करने से संसार के सभी दुखों से रक्षा मिलती है। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ देवी का स्मरण करता है, मां स्वयं उसकी जीवन-नाव पार लगाती हैं।उन्होंने श्रद्धा और सीमा की एक प्रेरक कथा सुनाई। कथा के अनुसार एक गांव में दो स्त्रियां रहती थीं—एक का नाम श्रद्धा और दूसरी का सीमा। श्रद्धा देवी में अटूट विश्वास रखती थी। वह प्रतिदिन मां जगदम्बा का स्मरण, जप और पूजा करती थी, चाहे उसके जीवन में कितनी ही कठिनाइयां क्यों न हों। दूसरी ओर सीमा का विश्वास परिस्थितियों पर निर्भर था—सुख में पूजा और दुख में शंका।एक समय दोनों के जीवन में भारी संकट आया। श्रद्धा ने पूर्ण विश्वास के साथ मां का सिमरण किया और कहा, “हे मां, जो भी होगा, आपकी इच्छा से होगा।” सीमा घबराकर इधर-उधर उपाय खोजने लगी। परिणामस्वरूप श्रद्धा को मानसिक शांति, धैर्य और अंततः संकट से मुक्ति मिली, जबकि सीमा चिंता और भय में उलझी रही। कथावाचक श्री रघुनंदन सारस्वत जी प्रवचनों की अमृत रस धारा प्रवाहित करते हुए कहा कि उपस्थित श्रोतागण कि मां जगदम्बा वहीं प्रकट होती हैं, जहां श्रद्धा होती है; सीमा नहीं। जब हम अपने विश्वास की सीमा तय कर देते हैं, तो कृपा भी सीमित हो जाती है। लेकिन जहां अटूट श्रद्धा होती है, वहां मां स्वयं रक्षक बन जाती हैं।इस कथा के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि देवी-स्मरण केवल शब्दों का जप नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण और विश्वास का भाव है। यही भाव भक्त को संसार के दुखों से मुक्त करता है और जीवन में शांति व समृद्धि प्रदान करता है।

