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“हिमाचल की डगमगाती अर्थव्यवस्था: राजनीति की प्राथमिकताओं, बढ़ते कर्ज और जनता पर चढ़ते करों के बोझ ने विकास की राह को किया संकटग्रस्त”

RamParkash Vats
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हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति आज जिस नाजुक मोड़ पर खड़ी है, वह किसी एक दिन का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे राजनीतिक अव्यवस्था, दूरदृष्टि की कमी और संसाधनों के अपर्याप्त दोहन का संचयी प्रभाव है। पहाड़ी राज्य होने के कारण हिमाचल की प्राकृतिक सीमाएँ निश्चित रूप से आर्थिक विकास की गति को प्रभावित करती हैं, लेकिन इससे भी अधिक गंभीर समस्या रही है—राजनीतिक दलों की वह प्रवृत्ति, जिसमें प्रदेश के हितों को अक्सर पार्टी की शक्ति-साधना के आगे बलि चढ़ा दिया गया। परिणामस्वरूप, सरकारें बदलती रहीं, लेकिन नीतियों की स्थिरता कभी विकसित नहीं हुई। विकास के दीर्घकालिक मॉडल पर कोई सुसंगत काम नहीं हुआ, और आम जनता पर बढ़ते करों का बोझ आज प्रदेश की आर्थिक सेहत का सबसे भयावह संकेत बन चुका है। चुनावी घोषणाएं भले ही विकास के दावे करती रहीं, मगर असलियत यह है कि हिमाचल की आर्थिक दिशा पीछे की ओर ढलान पर फिसलती रही

प्रदेश के प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, यह एक कटु सत्य है; जल, वन और पर्यटन जैसे क्षेत्रों का योगदान तो है, किंतु वह राज्य की आर्थिक संरचना को मज़बूत करने में पर्याप्त नहीं हो सका। इस सीमित संसाधन-संपदा की स्थिति में राज्य को चाहिए था कि वह तकनीक, सेवा-क्षेत्र और उद्योगों के रूप में नए आर्थिक आधार तैयार करे। लेकिन दुर्भाग्य से भाजपा हो या कांग्रेस—राजनीतिक दलों ने हिमाचल की अर्थव्यवस्था के लिए 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप कोई दीर्घकालिक औद्योगिक या सेवा-क्षेत्र मॉडल तैयार नहीं किया। पर्यटन जिस गति से हिमाचल की पहचान बन सकता था, वह गति कभी नहीं आ पाई; कारण—अधूरी योजनाएं, कमजोर बुनियादी ढांचा और राजनीतिक खींचातानी। केंद्र से मिलने वाली सहायता भी राजनीतिक संघर्षों के बीच उलझकर रह गई, और हिमाचल का वित्तीय भविष्य चुनावी रैलियों की घोषणाओं में खो गया। करों की बहुलता और नई-नई फीसों ने जनता को राहत देने के बजाय और अधिक बोझ तले दाब दिया।

आज हालत यह है कि हिमाचल पर चढ़ा कर्ज पहाड़ की चोटियों से भी ऊंचा हो चला है। विगत 55 वर्षों में आर्थिक ग्रोथ का जो रास्ता होना चाहिए था, वह उल्टा ‘‘डाउनवर्ड ग्रोथ’’ में तब्दील हो गया। यह स्थिति इसलिए और विडंबनापूर्ण लगती है क्योंकि राजनीतिक दलों के नेता भत्तों और वेतनवृद्धि पर तो पूर्ण सहमति बना लेते हैं, लेकिन जब कर्मचारियों, पेंशनरों या जनहित योजनाओं की बारी आती है तो वित्तीय संकट का रोना जोर-शोर से रोया जाता है। डिजिटल सेवाओं के नाम पर लोगों से ऊंचे-ऊंचे शुल्क वसूले जा रहे हैं—कई विभागों के ऑनलाइन पोर्टल जनता के लिए सुविधा से अधिक बोझ बन गए हैं। दूसरी ओर महंगाई और खाद्य पदार्थों के आसमान छूते दाम आम लोगों की जीवन-गति को थाम रहे हैं। यह वह स्थिति है जहां जनता पीस रही है और राजनीति अपनी-अपनी दिशा में स्वार्थों के पाल तानकर खड़ी है। प्रदेश की आर्थिक नाव पानी लेने लगी है, और ऊपर बैठे लोग जनता से भार कम करने के नाम पर उन्हीं के कपड़े निचोड़ने में लगे हुए हैं।

इस गहन चिंतन का मूल संदेश स्पष्ट है—हिमाचल को इस आर्थिक गर्त से निकालना है तो सबसे पहले कर्ज के बढ़ते बोझ को रोकना होगा। कर्ज विकास का साधन नहीं, बल्कि गलत नीतियों की परिणति है। उधारी से विकास नहीं होता; यह तो भविष्य पर भार डालता है और तीन गुना कीमत वसूल करता है। समाधान का रास्ता साफ है: प्रदेश के उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए, निवेश-अनुकूल माहौल तैयार किया जाए, पर्यटन को आधुनिक रूप में पुनर्परिभाषित किया जाए, और राजनीतिक दल चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर एक साझा आर्थिक रोडमैप तैयार करें। आवश्यकता है एक विशेष विधानसभा सत्र बुलाने की—सिर्फ और सिर्फ आर्थिक संकट पर। इसमें दोनों दल आत्ममंथन करें, राजनीतिक वाद-विवाद से बाहर आएं, और हिमाचल को एक साझा आर्थिक दृष्टि दें। यही वह क्षण है जहां राजनीति को शासन में बदलना होगा और सत्ता को सेवा में।

सारगर्भित संपादकीय निष्कर्ष

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