स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से ही तिरंगा शान से लहराता है।देश के लिए हँसते-हँसते प्राण न्यौछावर करने वाले वीरों कोभारतवासियों की ओर से कोटि-कोटि प्रणाम। जय हिंद!

भारत के स्वतंत्र सैनानी सैनानीयों को कोटि कोटि नमन लेखक संपादक राम प्रकाश बत्स
महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी दादाभाई नौरोजी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रदूतों में गिने जाते हैं। उनका जन्म 4 सितम्बर 1825 को बंबई (वर्तमान मुंबई) में एक साधारण पारसी परिवार में हुआ। बचपन से ही वे प्रतिभाशाली, जिज्ञासु और देश की स्थिति को लेकर चिंतित रहते थे। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त कर अध्यापन कार्य से अपने जीवन की शुरुआत की और एलफिंस्टन कॉलेज में प्रोफेसर बने। शिक्षा के दौरान ही उन्होंने भारतीय समाज की गरीबी और पिछड़ेपन को निकट से देखा। इससे उनके मन में अंग्रेजी शासन की नीतियों को समझने और उनका विरोध करने का विचार मजबूत हुआ। वे मानते थे कि जब तक भारत आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होगा, तब तक स्वतंत्रता का सपना अधूरा रहेगा। इसी सोच ने उन्हें एक महान राष्ट्रवादी चिंतक और स्वतंत्रता आंदोलन के मार्गदर्शक के रूप में स्थापित किया।
दादाभाई नौरोजी ने अंग्रेजी शासन की आर्थिक नीतियों का गहन अध्ययन किया और प्रसिद्ध “धन के निष्कासन सिद्धांत” प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि भारत की संपत्ति योजनाबद्ध तरीके से इंग्लैंड भेजी जा रही है, जिससे भारत दिन-प्रतिदिन निर्धन होता जा रहा है। उनके अनुसार भारी कर, विदेशों में वेतन पाने वाले अंग्रेज अधिकारी, और भारत से होने वाला निर्यात देश की आर्थिक कमजोरी का मुख्य कारण था। उन्होंने अपने तर्कों को आंकड़ों और तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया, जिससे अंग्रेजी शासन की वास्तविकता उजागर हुई। उनके इस विचार ने भारतीयों में नई चेतना पैदा की और स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार मिला। उन्होंने 1865 में लंदन इंडियन सोसाइटी तथा 1866 में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना कर भारत की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। इन संगठनों के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश जनता को भारत की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया।
दादाभाई नौरोजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने कांग्रेस को राष्ट्रीय आंदोलन का मजबूत मंच बनाया और 1886, 1893 तथा 1906 में तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने संवैधानिक तरीके से अधिकारों की मांग को मजबूत किया। 1892 में वे ब्रिटिश संसद के लिए चुने जाने वाले पहले भारतीय बने। लिबरल पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने हाउस ऑफ कॉमन्स में भारत की समस्याओं को प्रभावशाली ढंग से उठाया। यह घटना भारतीयों के लिए गर्व का विषय बनी और विश्व स्तर पर भारत की आवाज मजबूत हुई। उन्होंने ब्रिटिश शासन की अन्यायपूर्ण कर नीति, प्रशासनिक भेदभाव और आर्थिक शोषण पर खुलकर विरोध दर्ज कराया। इससे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा मिली और लोगों में आत्मविश्वास बढ़ा।
1901 में उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा भारत के आर्थिक शोषण का विस्तृत विवरण दिया। इस पुस्तक ने भारत ही नहीं बल्कि विश्व में भी ब्रिटिश शासन की नीतियों को उजागर किया। 1906 के कांग्रेस अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में “स्वराज” को भारत का लक्ष्य घोषित किया। यह घोषणा आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य मांग बन गई। 30 जून 1917 को इस महान राष्ट्रनायक का निधन हो गया, लेकिन उनके विचारों ने स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी। उन्हें सम्मानपूर्वक “भारत का ग्रैंड ओल्ड मैन” कहा गया। दादाभाई नौरोजी ने अपने ज्ञान, तर्क और राष्ट्रभक्ति से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत आधार दिया और वे सदैव महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्मरण किए जाते रहेंगे।

