संपादकीय दृष्टिकोण चिंतन मंथन और विश्लेषण:संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे में उभर रहा डॉक्टर-संकट अब केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि आने वाले समय की स्वास्थ्य आपातस्थिति का संकेत बन चुका है। हाल के आंकड़े हैरान करते हैं और चिंताएं गहरी करते हैं।2016 से 2019 के बीच जहाँ 102 डॉक्टरों ने सरकारी सेवा छोड़ी, वहीं 2020 के बाद यह समस्या तेज़ी से विस्फोटक रूप ले चुकी है। और सबसे चौंकाने वाली बात—वर्ष 2025 तक 25 डॉक्टरों ने तैनाती आदेश मिलने के बावजूद पदभार ही नहीं संभाला। यह किसी साधारण असंतोष का नहीं, बल्कि सिस्टम में बढ़ती अविश्वास और निराशा का स्पष्ट इशारा है।
इसी दौरान एक अहम कदम उठाते हुए स्वास्थ्य विभाग ने आईजीएमसी शिमला और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल चमियाणा के चार डॉक्टरों की सेवाएं सीसीएस (सीसीए) नियम 1965 के नियम 19 के तहत समाप्त कर दीं। इन डॉक्टरों ने पहले ही लिखित रूप में अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक परिस्थितियों के चलते सेवा जारी न रख पाने की जानकारी विभाग को दे दी थी। लेकिन विभागीय ढिलाई के चलते न उनकी अनुमति पर निर्णय लिया गया और न कोई समाधान निकाला गया। नतीजा—वे दोबारा ज्वाइन नहीं कर सके और उनकी अनुपस्थिति “अनधिकृत” घोषित हो गई।
यह घटनाएँ मिलकर एक गहरा सवाल खड़ा करती हैं—क्या सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में ऐसे हालात पैदा हो गए हैं कि डॉक्टर अपनीयोग्यता होने के बावजूद सरकारी नौकरी शुरू करने को तैयार ही नहीं?डॉक्टरों के पलायन के पीछे कई ठोस कारण उभर कर सामने आए हैं—निजी क्षेत्र में आकर्षक वेतन और सुविधाएँसरकारी अस्पतालों में भारी कार्यभार-संसाधनों की कमी दूरदराज क्षेत्रों में बिना प्राथमिक सुविधाओं के तैनाती पीजी बॉन्ड और सेवा शर्तों की कठोरता/विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि यदि सरकार ने वेतनमान, पदोन्नति, कार्यपरिस्थितियों और तैनाती नीतियों में तत्काल सुधार नहीं किए, तो यह संकट आने वाले वर्षों में और गहरा सकता है। डॉक्टरों का सरकारी सेवा से दूरी बनाना सीधे-सीधे जनता की स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी बोझ बनने वाला है।
स्वास्थ्य निदेशक डॉ. गोपाल बेरी का कहना है कि पीजी डॉक्टरों के लिए दो वर्ष सेवा देना अनिवार्य है, जबकि एमबीबीएस पर कोई बंधन नहीं। यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि अनिवार्यता से ज़्यादा ज़रूरत ऐसे माहौल की है जहाँ डॉक्टर रहना चाहें, न कि रहने को मजबूर हों।हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य में जहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ पहाड़ों की तरह ही कठिन हैं, डॉक्टरों का यह पलायन निश्चित ही एक गहरी चेतावनी है। अब ज़रूरत है तेज़, साहसी और दूरदर्शी सुधारों की—जिससे डॉक्टरों का भरोसा लौट सके और जनता की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

