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पौंगबांध विस्थापितों के अधिकारों की गूंज संसद में— न्याय, पुनर्वास और सम्मान की माँग

RamParkash Vats
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हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला वर्षों से एक ऐसे दर्द को ढो रहा है, जिसका समाधान आज तक अधूरा है—पौंग बांध (महाराणा प्रताप सागर) के विस्थापितों का पुनर्वास। इसी जनभावना व न्याय की आवाज़ को बुलंद करते हुए आज लोकसभा में पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं हमीरपुर सांसद अनुराग ठाकुर ने शून्य काल के दौरान पौंगबांध विस्थापितों का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया। उनकी इस माँग का समर्थन कांगड़ा के सांसद राजीव भारद्वाज ने भी किया।

50 वर्ष का इंतज़ार, अधूरे वादे और टूटी उम्मीदें:ब्यास नदी पर बने पौंग डैम से 339 गाँवों के 20,772 परिवार विस्थापित हुए थे। उस समय तत्कालीन केंद्र सरकार की ओर से इन परिवारों को राजस्थान में भूमि आवंटन का वादा किया गया था। लेकिन पाँच दशक बीत जाने के बाद भी अधिकांश परिवारों को उनका वैधानिक हक़ नहीं मिल पाया है।विस्थापितों की अगली पीढ़ियाँ आज भी इसी आशा में संघर्ष कर रही हैं कि उनके परिवारों के साथ हुआ अन्याय किसी दिन समाप्त होगा। खेती-बाड़ी से लेकर आजीविका तक, हर मोर्चे पर ये परिवार अस्थिरता और अभाव से जूझते आए हैं।

अनुराग ठाकुर ने रखी विस्थापितों की पीड़ा:लोकसभा में अपनी बात रखते हुए सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा”मैं देवभूमि हिमाचल से आता हूँ। यहाँ के लोगों ने देश के लिए पानी, जवानी और कुर्बानी देने में कभी कसर नहीं छोड़ी। लेकिन पौंग बांध विस्थापितों की दशा आज भी वही है। आखिर इन परिवारों का कसूर क्या है कि 50 साल बाद भी उन्हें पुनर्वास की पूरी सुविधा नहीं मिली?”उन्होंने बताया कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा किए गए निरीक्षणों और आधिकारिक रिपोर्टों में भी पुनर्वास की प्रक्रिया अधूरी पाई गई है। विस्थापितों की शिकायतें आज भी जस की तस बनी हुई हैं।

मिति गठन की माँग — समाधान की दिशा में बड़ा कदम:अनुराग ठाकुर ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया कि—जलशक्ति मंत्रालय, गृह मंत्रालय, तथा राजस्थान और हिमाचल प्रदेश सरकारों की संयुक्त भागीदारी से एक इंटर-मिनिस्ट्रियल कमेटी का गठन किया जाए, जो पुनर्वास प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति का आकलन कर ठोस और समयबद्ध समाधान दे।यह समिति दोनों राज्यों के बीच समन्वय स्थापित कर विस्थापित परिवारों को जमीन, मुआवजा और सुविधाओं का लंबित वितरण सुनिश्चित कर सकती है। यह कदम न केवल विस्थापितों की दशकों पुरानी पीड़ा को कम करेगा, बल्कि न्याय के सिद्धांत को भी मजबूत करेगा।

पौंगबांध विस्थापित—केवल आँकड़े नहीं, बल्कि संघर्ष की प्रतीक कहानी:पौंग बांध विस्थापितों का विषय केवल पुनर्वास का मुद्दा नहीं बल्कि सम्मान, अधिकार और न्याय का सवाल है।
इन परिवारों ने राष्ट्रीय विकास के लिए अपने गाँव, खेत और घर छोड़े। लेकिन बदले में उन्हें मिला इंतज़ार, भटकाव और अधूरी उम्मीदें।आज जब यह मुद्दा फिर संसद में मजबूती से उठा है, तो विस्थापितों में आशा की किरण जागी है कि शायद अब उनकी पीढ़ियों का संघर्ष समाप्त होगा।

पौंग बांध विस्थापितों के हित में उठी यह आवाज़ अब केवल हिमाचल की नहीं रही—यह राष्ट्रीय न्याय और पुनर्वास व्यवस्था की कसौटी बन चुकी है।संसद में उठी यह गूंज अब ठोस कदमों में बदले, यही हर विस्थापित परिवार की उम्मीद है।अब समय है कि पौंगबांध विस्थापितों को उनका अधिकार, सम्मान और सुरक्षित भविष्य मिले—जो उन्हें पाँच दशक पहले वादा किया गया था।

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