चिट्टा सिर्फ एक नशा नहीं—यह भविष्य का हत्यारा है।
लेकिन हिमाचल का संकल्प स्पष्ट है — “हमारा युवा बचेगा, हमारा समाज जीतेगा।”
अब जिम्मेदारी जनता की है।
हर घर, हर गांव, हर मोहल्ला इस अभियान का भागीदार बने।
नशा बेचने वालों को सामाजिक बहिष्कार मिले, और नशा छोड़ने वालों को सहायता व सम्मान।
Dharmshala,05/12/2025 ब्यूरो चीफ विजय समयाल
तपोवन स्थित विधानसभा परिसर में शुक्रवार का दिन हिमाचल के लिए ऐतिहासिक बन गया। पहली बार सत्ता पक्ष और विपक्ष एक ही मंच पर, एक ही स्वर में, एक ही संकल्प के साथ खड़े दिखाई दिए— चिट्टे (सफेद जहर) के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिए। यह दृश्य केवल राजनीति का नहीं, बल्कि समाज का संदेश था कि अब राज्य की युवा पीढ़ी को नशे के काले साये से बचाना ही सबसे बड़ा धर्म और कर्तव्य है।
भोजनावकाश के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों के विधायक दल एक साथ इकट्ठे हुए। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री एक पंक्ति में खड़े होकर स्पष्ट संकेत दे रहे थे कि जब बात युवाओं के जीवन की हो, तब राजनीति छोटी और समाज बड़ा हो जाता है। “चिट्टा भगाना है — युवाओं को बचाना है” जैसे नारे पूरे परिसर में गूंजे और जनहित की एक सशक्त आवाज बनकर उठे।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि 15 नवंबर को शिमला से शुरू हुई वॉकथॉन अब प्रदेशव्यापी जनआंदोलन का रूप लेगी। पंचायतों में विशेष ग्राम सभाएँ होंगी, जागरूकता अभियान छेड़े जाएंगे और चिट्टे की सूचना देने वालों के लिए इनाम की व्यवस्था भी की गई है। उन्होंने साफ कहा कि चिट्टा तस्करी में संलिप्त सरकारी कर्मचारियों की सूची तैयार हो रही है और गुप्त सूचना देने वालों का नाम उजागर करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यह कदम स्पष्ट करता है कि सरकार नशे के नेटवर्क को तोड़ने के लिए किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेगी।
वहीं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि नशा राजनीति का विषय नहीं—यह समाज, परिवार और भविष्य का प्रश्न है। उन्होंने जनता से अपील की कि जैसे स्वच्छता अभियान जन आंदोलन बना, वैसे ही चिट्टे के खिलाफ लड़ाई भी जन भागीदारी के बिना सफल नहीं होगी। विपक्ष ने सरकार को इस अभियान में बिना शर्त सहयोग का भरोसा दिया है, जो लोकतांत्रिक परंपरा का प्रेरक उदाहरण है।
उप मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने कहा कि चिट्टा सिर्फ प्रदेश की समस्या नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है। यह बाहरी देशों से पड़ोसी राज्यों के माध्यम से हिमाचल की ओर बह रहा है और अब सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँच चुका है। इसलिए लड़ाई अब केवल पुलिस या सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी बन चुकी है।
यह एक निर्णायक क्षण है।
हिमाचल की युवा शक्ति, परिवार, स्कूल—सब इस जहर की चपेट में आ सकते हैं, यदि समाज जागा नहीं। लेकिन सत्ता—विपक्ष का ऐसा मजबूत, साझा संकल्प उम्मीद जगाता है कि यदि राजनीति एक साथ खड़ी हो जाए, तो कोई भी समस्या बड़ी नहीं होती।

