शिमला, 27/11/2025/ Vijay Samyal
प्रदेश हाई कोर्ट ने अनुबंध सेवा अवधि को पेंशन लाभ में शामिल न करने पर प्रदेश सरकार के उच्च अधिकारियों को सख्त चेतावनी दी है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालती आदेशों की बार-बार अवहेलना न केवल न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है, बल्कि कोर्ट के बहुमूल्य समय की अनावश्यक बर्बादी भी है। खंडपीठ—न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा—ने टिप्पणी की कि यदि हालात ऐसे ही बने रहे, तो अदालत को सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकारियों और विभागाध्यक्षों को जेल भेजने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इसी क्रम में चीफ सेक्रेटरी को निर्देश दिए गए हैं कि दोषी अधिकारियों को सजा लागू होने से पहले आवश्यक गुजारे भत्ते की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
अदालत ने कहा कि मई 2025 में दायर की गई अनुपालना याचिकाओं पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना गम्भीर चिंता का विषय है। पिछली सुनवाई पर पारित आदेश के अनुरूप अनुपालना शपथपत्र तक दाखिल नहीं किया गया, जिससे सरकार की नीयत और कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है। अदालत ने सरकार को दो सप्ताह का अतिरिक्त समय देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि अब आदेश लागू करने के लिए मजबूरन कठोर कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा है। अदालत ने माना कि अनुबंध अवधि को पेंशन योग्य सेवा में जोड़ने के आदेश पहले ही स्पष्ट रूप से पारित किए जा चुके हैं, जिनका अनुपालन होना आवश्यक है।
हाई कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि अवमानना से जुड़े लगभग 1300 मामले लंबित हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि सरकारी तंत्र अदालती आदेशों के पालन में गंभीर नहीं है। अदालत ने टिप्पणी की कि सरकार में ऊँचा पद मिलने के साथ कानून के अनुसार कार्य करने की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है। अदालती आदेशों की निरंतर अनदेखी न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि न्याय व्यवस्था के प्रति अस्वीकार्य उदासीनता भी। अनेक याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर सैकड़ों अनुपालना याचिकाओं पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने दोहराया कि अनुबंध अवधि को पेंशन लाभ में जोड़ने के आदेश तत्काल लागू करना सरकार का बाध्यकारी दायित्व है।

