रैलियों में बिना हेलमेट दोपहिया वाहन चलाने पर उठे सवाल, क्या राजनीतिक दलों को कानून से छूट?
देश के सड़कों पर आम नागरिक बिना हेलमेट दोपहिया चलाए पकड़ा जाए तो तुरंत ₹1,000-1500 का चालान, ई-चालान की धमक, और कई राज्यों में ड्राइविंग लाइसेंस तीन महीने के लिए निलंबित कर दिया जाता है। मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत यह स्पष्ट अपराध है। नियम भी सही हैं—क्योंकि सड़क सुरक्षा किसी वर्ग या व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। लेकिन सवाल यह है कि जब यही नियम राजनीतिक दलों की रैलियों, शो-ऑफ शक्ति प्रदर्शन और चुनावी जुलूसों में टूटते हैं, तो आखिर यह कानून किस जेब में रख दिया जाता है?
यह दृश्य हर राज्य में देखा जा सकता है—लहराते झंडों के बीच दोपहिया वाहनों पर पीछे-पीछे लंबी कतारें, तेज़ रफ्तार, न हेलमेट, न नंबर प्लेट की चिंता, और न ट्रैफिक अनुशासन का कोई भाव। कानून जहां आम नागरिक के गले पर कसा हुआ है, वहीं राजनीतिक रैलियों में वह लगभग छुट्टी पर जाता दिखाई देता है। क्या यह लोकतंत्र का वह रूप है जिसमें ‘शासन’ कानून बनाता भी है और उसे तोड़ने की खुली छूट भी खुद को दे देता है?
यह तथ्य कटु है पर सच यही है—भारत में कानून उतना ही सख्त है जितना उसे लागू करने वाला राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होता है। जब राजनीतिक दलों के समर्थक बिना हेलमेट और बिना नियमों के सड़कों पर बहाव की तरह निकलते हैं, तो पुलिस अक्सर ‘निर्देशों’ की आड़ में कार्रवाई करने से बचती है। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता का भी अपमान है।
सवाल उठाना जरूरी है—
क्या कोई राजनीतिक दल कानून से ऊपर है?
स्पष्ट जवाब है—नहीं।
मोटर वाहन अधिनियम किसी को कोई विशेषाधिकार नहीं देता, न नेताओं को, न उनके कार्यकर्ताओं को। हेलमेट नियम से छूट केवल चिकित्सा आपात स्थिति या मान्य अपवादों में ही है, राजनीति इनमें शामिल नहीं है।
लेकिन असली चिंता सिर्फ जुर्माने की नहीं—यह उस मानसिकता की है जो सोचती है कि लोकतंत्र केवल वोट और रैलियों तक सीमित है। अगर राजनीतिक शक्तियाँ स्वयं कानून का पालन नहीं करेंगी, तो जनता को पालन कराने का नैतिक अधिकार भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा। इससे वे स्थितियाँ पैदा होती हैं जिन पर आम आदमी बार-बार प्रश्न करता है—“जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ, तो जाएँ तो कहाँ जाएँ?”
उत्तर कठिन नहीं है—कानून का सम्मान तभी बढ़ेगा जब राजनीतिक दल अपनी रैलियों को भी उसी अनुशासन में लाएँ जैसे वे अपने घोषणापत्रों में कानून-व्यवस्था की बातें करते हैं। पुलिस प्रशासन को भी वह स्वतंत्रता और हिम्मत होनी चाहिए कि वह नियमों के उल्लंघन पर किसी भी व्यक्ति या गुट के विरुद्ध समान कार्रवाई कर सके।
आख़िरकार, लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता होती है। और जनता की सुरक्षा—चाहे वह सड़क सुरक्षा हो या सार्वजनिक व्यवस्था—किसी रैली की राजनीतिक ऊर्जा से अधिक महत्वपूर्ण है। सड़क पर बिना हेलमेट चलना सिर्फ कानून तोड़ना नहीं, बल्कि जीवन से खिलवाड़ है। और इससे भी बड़ा खिलवाड़ यह है कि राजनीतिक दल इस अव्यवस्था को अपने ‘पारंपरिक अधिकार’ की तरह इस्तेमाल करें।
समय आ गया है कि सभी दल यह संदेश दें—कानून का पालन ही हमारी सबसे बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी है। तभी लोकतंत्र सुरक्षित भी रहेगा और सम्मानित भी।

