“बेरोज़गारी का बढ़ता ग्राफ और ठेका संस्कृति: स्थायी नौकरियों का दरवाज़ा क्यों बंद हो रहा है”
देश में बेरोज़गारी का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है और सरकार व रोजगार एजेंसियों के तमाम दावों के बावजूद युवाओं के लिए स्थायी नौकरियों के अवसर तेजी से सिमटते दिख रहे हैं। नवीनतम श्रम सर्वेक्षणों और ग्राउंड रिपोर्टों से भी यही संकेत मिलता है कि नियमित, सुरक्षित और स्थायी रोजगार की जगह अब “ठेके पर नौकरी” यानी कॉन्ट्रैक्ट-बेस्ड वर्क तेजी से बढ़ रहा है। यह बदलाव केवल आर्थिक संरचना का नतीजा नहीं, बल्कि एक गहरी नीति-गत कमजोरी और सामाजिक-आर्थिक असंतुलन की चेतावनी है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि सरकारी विभागों में भी स्थायी पदों की जगह कॉन्ट्रैक्ट, आउटसोर्सिंग और दैनिक वेतनभोगी पदों का चलन बढ़ रहा है। एक समय जिस सरकारी नौकरी को स्थायित्व और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता था, वही आज ठेके के बोझ तले दबती जा रही है। विभागों में रिक्तियों का वर्षों तक न भरना, भर्ती प्रक्रिया का धीमा पड़ना और पदों को ‘आउटसोर्स्ड सेवाओं’ में बदल देना युवाओं में निराशा गहरा रहा है। सबसे अधिक प्रभावित वे युवा हैं जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगाए, लेकिन परिणामस्वरूप अवसर सीमित होते चले गए।
उद्योगों और निजी क्षेत्र की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। कंपनियाँ लागत घटाने और लचीलापन बढ़ाने के लिए स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति से बच रही हैं। तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के बढ़ते उपयोग ने लाखों नौकरियों को अप्रासंगिक बना दिया है। जिन स्थानों पर कर्मचारी चाहिए भी, वहाँ अस्थायी अनुबंध पर युवा लगाए जा रहे हैं—न तो सामाजिक सुरक्षा का लाभ, न पीएफ, न मेडिकल, न भविष्य का कोई भरोसा। ठेकेदारों के माध्यम से रोजगार मिलने से वेतन में भी भारी असमानता पैदा हुई है—एक ही कार्यस्थल में स्थायी कर्मचारी अधिक वेतन और सुविधाएँ प्राप्त करते हैं जबकि ठेका कर्मचारियों को महीने के अंत में मिलने वाला वेतन भी सुनिश्चित नहीं।
इसके साथ ही बेरोज़गारों की संख्या में तेज़ी से हुई बढ़ोतरी एक सामाजिक चुनौती बन रही है। लाखों डिग्रीधारी युवा या तो छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में अनिश्चित भविष्य का दांव लगा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ कृषि पर निर्भरता लगातार घट रही है लेकिन वैकल्पिक रोजगार के अवसर नहीं बन रहे। शहरी क्षेत्रों में भी असंगठित क्षेत्र की नौकरियों का विस्तार बेरोज़गारी की समस्या को केवल “छुपा” रहा है, हल नहीं कर रहा।
इन परिस्थितियों में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि रोजगार के “पटारे” को बंद करने का यह सिलसिला कब रुकेगा? सरकारों के स्तर पर औद्योगिक निवेश, विनिर्माण विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्टार्टअप — ये सभी कागज़ों में आकर्षक लगते हैं, परंतु जमीनी हकीकत में उनका लाभ सीमित वर्ग तक ही पहुँच रहा है। रोजगार सृजन नीतियों में आवश्यक सुधार नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में “कॉन्ट्रैक्ट आधारित भारत” लगभग स्थायी सत्य बन जाएगा।
समाधान स्पष्ट हैं लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से वे लागू नहीं हो रहे। सबसे पहले, सरकारी विभागों में नियमित रिक्तियों को प्राथमिकता के आधार पर भरना चाहिए। दूसरी बात, ठेका नीति की समीक्षा होनी चाहिए—जहाँ ठेकेदारी बनी रहे, वहाँ न्यूनतम वेतन, सेवा सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा सुविधाएँ सुनिश्चित की जाएँ। तीसरा, कौशल विकास कार्यक्रमों को केवल प्रमाणपत्र वितरण तक सीमित न रखकर उद्योगों से जोड़ना होगा ताकि युवा वास्तविक रोजगार पा सकें। चौथा, छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए प्रोत्साहन बढ़ाया जाए ताकि वे स्थायी नौकरियाँ देने पर मजबूर न हों।
युवाओं की ऊर्जा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होती है। लेकिन यदि वही युवा स्थायी भविष्य की ओर बढ़ने के बजाय अस्थायी नौकरियों के दलदल में धँसते जाएँ, तो देश का विकास भी ठहर जाएगा। बेरोज़गारी का यह बढ़ता ग्राफ केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी है। समय रहते सरकार, उद्योग और समाज ने मिलकर इसके समाधान की दिशा नहीं पकड़ी, तो यह संकट एक पूरे पीढ़ी का संकट बन सकता है।

