नई दिल्ली, 22 नवम्बर, न्यूज़ इंडिया आजतक सूत्र
देश में श्रम सुधारों को लेकर संघर्ष एक बार फिर गर्म हो गया है। केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई नई श्रम संहिताओं के विरोध में All India Trade Union Congress (AITUC) सहित लगभग दस बड़े केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने आज राष्ट्रव्यापी धरना-प्रदर्शन का आह्वान किया। यह कदम देश के औद्योगिक, सरकारी और असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे लाखों कामगारों की आवाज़ को एक मंच पर लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
दशकों पुराने कानूनों में सबसे बड़ा बदलाव :सरकार का दावा है कि श्रम कानूनों में चार नए श्रम कोड शामिल करना आर्थिक सुधारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। इन कोड्स—वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा—को एकीकृत कर मौजूदा सिस्टम को सरल और पारदर्शी बनाना लक्ष्य बताया गया है। परन्तु ट्रेड यूनियनों का कहना है कि “सरलीकरण” के नाम पर श्रमिकों के मूल अधिकारों में कटौती की जा रही है।
यूनियनों की कड़ी प्रतिक्रिया: यूनियनों ने सरकार की इस पहल को “कामगार विरोधी” करार दिया है। उनका आरोप है कि नए कोड लागू होने से ठेका श्रमिकों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों की सुरक्षा कमजोर होगी,सामाजिक सुरक्षा फंड और भविष्य निधि जैसी सुविधाओं में कर्मचारियों की स्थिति कमजोर पड़ सकती है,औद्योगिक विवादों में कर्मचारियों की bargaining power घट जाएगी।
प्रदर्शन में शामिल नेताओं का कहना है कि नए नियम नियोक्ताओं को अधिक अधिकार देते हैं, जबकि कामगारों के लिए शिकायत दर्ज करने और न्याय पाने का रास्ता जटिल बनाते हैं।
संवादहीनता से बढ़ रही दूरी : धरना-प्रदर्शनों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि सरकार और ट्रेड यूनियनों के बीच संवाद क्यों ठप है। श्रम विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े कानून सुधार बिना व्यापक परामर्श के लागू किए गए, जिसके कारण असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
आज के प्रदर्शनों से स्पष्ट रूप से यह संकेत मिला कि कामगार संगठन सरकार से आमने-सामने चर्चा की मांग पर अडिग हैं। कई यूनियनों ने कहा कि जब तक ठोस वार्ता शुरू नहीं होती, विरोध तेज़ किया जाएगा।
राष्ट्रव्यापी प्रभाव: दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता सहित देश के प्रमुख औद्योगिक शहरों में सुबह से ही यूनियनें सड़कों पर उतर गईं। फैक्टरियों, दफ्तरों, सरकारी उपक्रमों और निर्माण स्थलों पर आंशिक रूप से कामकाज बाधित होने की खबरें भी आईं।
विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, परन्तु नारों और पोस्टरों के माध्यम से कामगारों ने अपनी असंतुष्टि स्पष्ट की।
आगे क्या: सरकार की ओर से तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, परन्तु राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह विरोध लंबे समय तक चलता है तो उद्योग जगत पर इसका व्यापक असर पड़ेगा।
ट्रेड यूनियनों ने चेतावनी दी है कि यदि मांगों पर विचार नहीं हुआ, तो आने वाले सप्ताहों में हड़ताल जैसे कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।
नए श्रम कोडों को लेकर शुरू हुआ यह संघर्ष सिर्फ नियमों में संशोधन का मुद्दा नहीं बल्कि देश के करोड़ों कामगारों के भविष्य से जुड़ी गंभीर चिंता है। आज का राष्ट्रव्यापी विरोध साफ़ इशारा करता है कि श्रम सुधारों की राह संवाद और सहमति से ही आगे बढ़ सकती है। सरकार और यूनियनों के बीच संवाद बहाली ही इस तनाव को कम करने का एकमात्र रास्ता है।

