ऑनलाइन प्रक्रिया ने बढ़ाई गति, पर शुल्क संरचना ने बढ़ाई चिंता
प्रति पेज 26.50 रुपये—क्या यह डिजिटल इंडिया के अनुरूप है?

राजस्व विभाग का कार्य लगभग पूरी तरह डिजिटल होने के बाद सरकार इसे “सुशासन” की बड़ी उपलब्धि बताती है। लोकमित्र केंद्रों के माध्यम से जमाबंदी, नकल, एफिडेविट और अन्य प्रमाण पत्र अब घर के समीप ही उपलब्ध हैं। निस्संदेह, इससे प्रक्रिया में गति आई है और लोगों की आवाजाही कम हुई है।लेकिन इस डिजिटल प्रगति के बीच एक गहरा सवाल खड़ा हो रहा है—क्या ऑनलाइन व्यवस्था जनता के लिए सस्ती और सरल हुई है, या नागरिकों की जेब पर नया बोझ डाल दिया गया है?
मजबूरी के आगे नागरिक बेबस, शुल्क की जानकारी अस्पष्ट
राजस्व विभाग से जुड़े दस्तावेज अधिकतर न्यायालय, बैंक या सरकारी कार्यालयों में समयबद्ध रूप से प्रस्तुत करने होते हैं। यही कारण है कि आम नागरिक विकल्पों के अभाव में लोकमित्र केंद्रों द्वारा वसूले जा रहे शुल्क को स्वीकार करने पर मजबूर हो जाता है।अक्सर यह देखा गया है कि शुल्क पहले से स्पष्ट रूप में प्रदर्शित नहीं होता। नागरिकों को तब ही पता चलता है जब वे दस्तावेज लेने काउंटर पर पहुँच जाते हैं। यह पारदर्शिता और मानवता—दोनों की परीक्षा है।
लेकिन वास्तविकता यह है कि—डिजिटल सुविधा का आर्थिक लाभ सरकार और लोकमित्र केंद्रों को मिल रहा है—-जबकि लागत पहले से अधिक उपभोक्ता द्वारा चुकाई जा रही है ?——यह स्थिति डिजिटल इंडिया के मूल भाव—सस्ती, सरल, सर्वसुलभ—से मेल नहीं खाती।
क्या शुल्क पुनरीक्षण की आवश्यकता नहीं?
संपादकीय दृष्टिकोण से मूल प्रश्न यही है कि राजस्व दस्तावेजों पर इतना अधिक शुल्क क्यों?
जब डिजिटलाइजेशन का उद्देश्य लागत घटाना, डेटा सुरक्षित रखना और सुविधाएँ सरल बनाना था, तो उपभोक्ता को बढ़ा हुआ शुल्क क्यों देना पड़ रहा है……..?
सरकार यदि वास्तव में जनता-उन्मुख डिजिटल नीति चाहती है तो उसे शुल्क संरचना की समीक्षा*केंद्रों की पारदर्शिता*सेवा शुल्क में कटौतीऔर ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए राहत पैकेजजैसे कदमों पर विचार करना चाहिए।डिजिटल विकास का अर्थ तभी सार्थक है जब आम नागरिक को राहत मिले, न कि उसकी जेब पर अतिरिक्त भार पड़े।
राजस्व विभाग में आज भी कागज़ों का वह अंतहीन सिलसिला जारी है, जो एक बार शुरू हो जाए तो आसानी से ख़त्म नहीं होता। काम भले ही पूरा हो जाए, लेकिन कागज़ पीछे नहीं छोड़ते—एक दस्तावेज़ पूरा करो तो दूसरा तैयार।इसी प्रशासनिक जटिलता के बीच एक बड़ा सवाल लगातार उठ रहा है—क्या सरकारी निर्धारित मूल्य व सेवा शुल्क आम नागरिक के हित में वाजिब हैं?
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार हर पेज पर लगने वाली लागत आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ बनती जा रही है।
सरकारी तय शुल्क की वास्तविकता
सरकारी निर्धारित मूल्य: 16.50 रुपये —सेवा शुल्क: 10 रुपये——-कुल प्रति पेज खर्च: 26.50 रुपये*कई बार मात्र एक दस्तावेज़ के लिए ही 15–20 पन्ने लग जाते हैं, और यदि काम थोड़ा बड़ा हो तो यह संख्या 40–50 पन्नों तक पहुंच जाती है। यह स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों के उन लोगों के लिए और कठिन है जो रोज़मर्रा की मेहनत-मज़दूरी से अपनी आजीविका चलाते हैं।
50 पेज के दस्तावेज़ की कुल लागत
प्रति पेज लागत: 26.50 रुपये—-इस हिसाब से —50 पेज × 26.50 = 1325 रुपयेयानी सिर्फ़ एक औसत दस्तावेज़ तैयार कराने में ही आम नागरिक को 1325 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।यह राशि उन परिवारों के लिए बोझ है जिनकी मासिक आय सीमित है।अक्सर लोग कहते हैं कि वास्तविक लागत इससे कहीं कम आती है—प्रिंटिंग, पेपर और प्रोसेसिंग मिलाकर भी खर्च लगभग 13.50 रुपये प्रति पेज से ज्यादा नहीं बैठता।फिर सवाल उठता है—आख़िर यह अतिरिक्त राशि क्यों वसूली जा रही है?क्या विभाग इन शुल्कों की समीक्षा करने को तैयार है? जनता की अपेक्षा स्पष्ट है—सरकार को निर्धारित मूल्य कम करने चाहिए, और राजस्व विभाग में काग़ज़ी प्रक्रियाओं को सरल, डिजिटल तथा पारदर्शी बनाया जाए, ताकि नागरिकों पर बेवजह का आर्थिक बोझ न पड़े।

