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हिमाचल प्रदेश में दुर्घटनाएँ क्यों बढ़ रही हैं?

RamParkash Vats
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(संपादकीय मंथन, चिंतन और विश्लेषण)संपादक राम प्रकाश,

हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में सड़क दुर्घटनाओं का बढ़ना कोई नई समस्या नहीं है, परंतु पिछले कुछ वर्षों में यह चुनौती अधिक गंभीर और चिंताजनक रूप ले चुकी है। पहाड़ी भूगोल स्वाभाविक रूप से जोखिमपूर्ण होता है—संकीर्ण सड़कें, तीखे मोड़, गहरी घाटियाँ और मौसम का अचानक बदल जाना दुर्घटनाओं की संभावना को बढ़ाता है। लेकिन यहाँ सवाल केवल प्राकृतिक परिस्थितियों का नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही, प्रशासनिक ढिलाई और बढ़ते ट्रैफिक दबाव का भी है। जब कठिन भूगोल और मानव-जनित गलतियाँ साथ मिलकर काम करती हैं, तो दुर्घटनाएँ लगभग अनिवार्य-सी बन जाती हैं। यही कारण है कि हिमाचल में आज सड़क सुरक्षा एक प्रमुख सामाजिक और प्रशासनिक चिंता बन चुकी है।

सड़कों के रखरखाव में लापरवाही। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कें वर्षा, भूस्खलन और तापमान में तीव्र बदलाव के कारण जल्दी खराब होती हैं, लेकिन उनकी समय पर मरम्मत नहीं की जाती। कई मार्गों पर गड्ढे, धँसे हिस्से और टूटे किनारे दिखना आम बात है। कई जगह तो वर्षों से टूटी सड़कें जस की तस पड़ी हैं। जहाँ मरम्मत हो भी जाती है, वहाँ अक्सर क्रैश बैरियर ही नहीं लगाए जाते, जबकि पहाड़ों में यह सबसे बड़ा सुरक्षा तत्व होता है। रखरखाव की इसी कमी के कारण छोटे-से वाहन नियंत्रण खोकर गहरी खाई में गिर जाते हैं, जिसके परिणाम अक्सर अत्यंत दुखद होते हैं।

चौंक और चौराहों पर लाइट सिस्टम की कमी। हिमाचल के अधिकांश कस्बों और छोटे शहरों में ट्रैफिक लाइटें, ज़ेब्रा क्रॉसिंग, गति संकेतक या चेतावनी बोर्ड नहीं हैं। रात के समय कई सड़कें अत्यंत अंधेरी रहती हैं, जहाँ एक छोटे मोड़ पर भी वाहन चालक को सामने आते वाहन का अनुमान नहीं लग पाता। परिणामस्वरूप टक्कर, फिसलन और गलत साइड में घुसने जैसी घटनाएँ बढ़ जाती हैं। प्रशासनिक स्तर पर यह एक बड़ी चूक कही जा सकती है, क्योंकि भीड़भाड़ वाले चौराहों पर आधुनिक ट्रैफिक सिस्टम न होना दुर्घटनाओं को खुला निमंत्रण देना है।

तीसरा कारण है—नशे में वाहन चलाने की प्रवृत्ति। शराब या नशीले पदार्थों के सेवन के बाद वाहन चलाना किसी भी सड़क पर खतरनाक है, लेकिन पहाड़ी सड़कों पर यह कई गुना अधिक जोखिमपूर्ण हो जाता है। यहाँ एक क्षण की ढील भी वाहन को खाई में धकेल सकती है। हर वर्ष बड़ी संख्या में हादसे केवल इसलिए होते हैं कि चालकों ने नशे की हालत में वाहन चलाया। यह प्रवृत्ति न केवल उनके लिए, बल्कि सड़क पर चल रहे हर व्यक्ति के लिए खतरा बन जाती है।

स्टंटबाज़ी और तेज़ रफ़्तार का बढ़ता चलन। युवाओं में स्पीडिंग, ज़ोरदार ओवरटेकिंग, और सोशल मीडिया के लिए स्टंट करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। पहाड़ी मोड़ों पर तेज़ रफ़्तार सीधा जोखिम है, क्योंकि सड़क की चौड़ाई कम है और दृश्यता सीमित। ज़रा-सी चूक वाहन को अनियंत्रित कर देती है, जिसके परिणाम घातक होते हैं। पुलिस द्वारा बार-बार चेतावनी देने के बावजूद यह आदत तेजी से बढ़ रही है, खासकर पर्यटन स्थलों के आसपास।

पाँचवाँ कारण है—वाहनों की खराब स्थिति। कई बसें, टैक्सियाँ और निजी वाहन बिना उचित फिटनेस, बिना सर्विस और कभी-कभी ओवरलोड होकर चलाए जाते हैं। ब्रेक फेल होना, टायर फटना, स्टेयरिंग में खराबी आना—ये समस्याएँ पहाड़ी यात्राओं में किसी बड़े हादसे का कारण बन जाती हैं। सरकारी और निजी दोनों परिवहन व्यवस्थाओं में फिटनेस जांच को गंभीरता से न लेने के परिणाम सीधे दुर्घटनाओं में दिखाई देते हैं।

अवैज्ञानिक और जल्दबाज़ी में किया गया सड़क निर्माण। कई सड़कों पर मोड़ अत्यंत तीखे होते हैं, जहाँ बैरियर और चौड़ाई दोनों अपर्याप्त होती हैं। कई बार सड़क चौड़ीकरण बिना भूगर्भीय अध्ययन के कर दिया जाता है, जिससे बारिश में सड़क धँस जाती है या पहाड़ कटने के बाद अस्थिर हो जाता है। यह अवैज्ञानिक निर्माण यात्रियों, स्थानीय लोगों और पर्यटकों सभी के लिए बड़ा खतरा है।

पर्यटन सीज़न में अत्यधिक भीड़ और अनुभवहीन ड्राइवर। हिमाचल भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है, और छुट्टियों के दौरान लाखों पर्यटक आते हैं। बाहरी राज्यों के कई चालक पहाड़ी मार्गों पर वाहन चलाने में अनुभवहीन होते हैं। उनकी छोटी गलतियाँ भी बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं। भीड़ के कारण ट्रैफिक जाम, ओवरटेकिंग की मजबूरी और अधीरता के कारण हालत और बिगड़ जाती है।

समाधान स्पष्ट हैं—सड़कों का नियमित रखरखाव, चौराहों पर लाइट सिस्टम, नशे में गाड़ी चलाने पर कठोर दंड, स्टंटबाजी पर रोक, वाहनों की फिटनेस जांच, वैज्ञानिक सड़क निर्माण और पर्यटन सीज़न में ट्रैफिक नियंत्रण। यदि इन पहलुओं पर गंभीरता से काम किया जाए, तो हिमाचल प्रदेश को सड़क दुर्घटनाओं से काफी हद तक सुरक्षित बनाया जा सकता है।

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