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संपादकीय मंथन,चिंतन और विश्लेषण :परंतु असली प्रश्न यह था कि क्या यह सम्मान केवल नेताओं के लिए आरक्षित था? क्या लोकतंत्र की लड़ाई का इतिहास केवल राजनीतिक मंचों तक ही सीमित था….?

RamParkash Vats
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संपादकीय चिंतन, मंथन और विश्लेषण: संपादक राम प्रकाश वत्स

“लोकतंत्र पर पेंशन नहीं—राजनीति की एक प्रथा का अंत”

हिमाचल प्रदेश में लोकतंत्र प्रहरी पेंशन का अध्याय बंद हो चुका है। राष्ट्रपति द्वारा लोकतंत्र प्रहरी विधेयक निरसन को मंजूरी और राजपत्र में अधिसूचना जारी होने के बाद वह राजनीतिक बहस अब समाप्त हो गई, जो दो वर्षों से सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं के बीच अनदेखी रस्साकशी बनकर खड़ी थी। यह फैसला केवल एक विधेयक की विदाई नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सोच पर प्रहार है जिसमें लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर सरकारी कोष को विचारधारा आधारित पुरस्कारों में बदला जाने लगा था। सवाल यह था, और रहेगा—क्या लोकतंत्र केवल नेताओं की जागीर है? क्या आपातकाल के विरोध का अधिकार केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित था? यह फैसला इन प्रश्नों को नए सिरे से परिभाषित करता है।

राजनीति के विशेष लाभ—सम्मान या सौदा?

भाजपा सरकार ने वर्ष 2021 में इस पेंशन योजना की शुरुआत करते हुए इसे लोकतंत्र की पुनर्स्थापना करने वालों के सम्मान का नाम दिया था। 12,000 से 20,000 रुपये तक मासिक राशि देने का निर्णय हुआ, और 105 नेता इसका लाभ उठाने लगे। नामों की सूची में बड़े नेता थे—पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार, पूर्व मंत्री राधारमण शास्त्री, सुरेश भारद्वाज जैसे वे चेहरे, जिनका राजनीतिक कद किसी प्रमाणपत्र का मोहताज़ नहीं। परंतु असली प्रश्न यह था कि क्या यह सम्मान केवल नेताओं के लिए आरक्षित था? क्या लोकतंत्र की लड़ाई का इतिहास केवल राजनीतिक मंचों तक ही सीमित था? यदि आपातकाल की यातना लोकतंत्र का मूल्यांकन है, तो पत्रकारों की कलम क्यों नहीं देखी गई? कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज़ क्यों नहीं सुनी गई? हजारों सामान्य नागरिक जिन्होंने जेल, धक्के, दमन और उत्पीड़न झेला—क्या उनके लोकतंत्र के हिस्से में कोईभीहो सम्मान नहीं था? यही वह बिंदु था जहाँ सम्मान राजनीति से टकराता है और सरकार के निर्णय को नैतिकता की ढाल मिलती है।

सरकार बनाम राजभवन—दलीय नहीं, संवैधानिक टकराव

इस विधेयक पर सबसे दिलचस्प स्थितियाँ विधानसभा के भीतर नहीं, बल्कि राजभवन और राज्य सरकार के बीच पैदा हुईं। राज्यपाल ने बार-बार पूछा—निरसन क्यों? लाभ रोकने का कारण क्या? क्या लोकतंत्र के रक्षकों का सम्मान गलत है? सरकार का तर्क साफ था—यह योजना लोकतंत्र प्रहरी कम, राजनीतिक प्रहरी योजना अधिक बन चुकी थी। इसे न्याय नहीं, पक्षपात की संज्ञा मिल रही थी। यदि पेंशन किसी आदर्शवाद का पुरस्कार है, तो मानदंड पारदर्शी और सर्वसमावेशी होने चाहिए थे। पर स्थिति उलट थी—इसका लाभ केवल उन लोगों तक सीमित रहा जो एक विशेष राजनीतिक छतरी के नीचे खड़े थे। राज्यपाल के बार-बार सवाल लौटाने, नाराज़गी जताने और सरकार द्वारा पुनः प्रस्ताव भेजने से यह संघर्ष राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक असहमति बन गया। अंततः राष्ट्रपति की मंजूरी ने इसे विधिक विराम दिया और सरकार का तर्क मजबूत साबित हुआ।

राजनीति का मोहभंग—और एक स्पष्ट संदेश

इस निरसन ने वह राजनीतिक प्रथा समाप्त की जिसमें लोकतंत्र की रक्षा की व्याख्या सत्ता की सुविधा से तय होती थी। लोकतंत्र पद, पुरस्कार और पेंशन का विषय नहीं है—यह जनता का विश्वास है। जनता का संघर्ष सत्ता में बैठने वालों से बड़ा होता है; उसकी कीमत संसद से नहीं, इतिहास से तय होती है। यह निर्णय उसी सत्य को दोहराता है। आज जब सरकारी खजाना विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी उठाता है, तब विचारधारा आधारित पुरस्कार योजनाएँ लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक संस्कृति को कमजोर करती हैं। सरकार का यह कदम केवल आर्थिक बचत नहीं—एक नैतिक संदेश है। लोकतंत्र सम्मान का विषय है, लेन–देन का नहीं। हम यह भरोसा रखना चाहें या नहीं, पर यह सच है कि इस निरसन के साथ राजनीति की एक विशेष परंपरा—‘समर्थकों के लिए सरकारी सम्मान’—अपना अंतिम संस्कार देख चुकी है।


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