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पंचायत पुनर्गठन पर सियासी गहमागहमी: सत्ता पक्ष की रणनीति और चुनाव आयोग की तैयारी आमने-सामने

RamParkash Vats
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हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। एक ओर जहां राज्य सरकार पंचायतों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य निर्वाचन आयोग भी चुनावी तैयारियों में जुट गया है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में पंचायत चुनावों के समय और प्रक्रिया को लेकर सरकार और आयोग के बीच टकराव या खींचतान की स्थिति बन सकती है।

राज्य सरकार ने पंचायत पुनर्गठन की प्रक्रिया दोबारा शुरू कर दी है। पंचायतीराज विभाग ने सभी जिलों के उपायुक्तों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने जिलों से संबंधित पुनर्गठन प्रस्तावों की समीक्षा कर 15 दिन के भीतर रिपोर्ट भेजें। सरकार का कहना है कि जुलाई से सितंबर के बीच प्राकृतिक आपदा के चलते राहत कार्यों में व्यस्तता के कारण कई प्रस्ताव लंबित रह गए थे। अब उन्हें प्राथमिकता से निपटाया जाएगा, ताकि आगामी पंचायत चुनावों से पहले प्रशासनिक ढांचा मजबूत किया जा सके।

लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस कदम को केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष की चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि सरकार पंचायतों की सीमाएं और क्षेत्रीय पुनर्गठन के जरिये राजनीतिक रूप से प्रभावशाली वर्गों और क्षेत्रों को साधने का प्रयास कर रही है। ग्रामीण स्तर पर पुनर्गठन का सीधा असर स्थानीय नेतृत्व, आरक्षण निर्धारण और विकास फंड वितरण पर पड़ता है, जो आगामी चुनावों में वोट समीकरण को प्रभावित कर सकता है।

इसी बीच, राज्य निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2025 या जनवरी 2026 में प्रस्तावित पंचायत और शहरी निकाय चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों और उपायुक्तों को निर्देश दिए हैं कि वे सहायक रिटर्निंग अधिकारियों की नियुक्ति, पोलिंग दलों का गठन, वाहनों की व्यवस्था, मीडिया सेल, कंट्रोल रूम और मतगणना केंद्रों की पहचान जैसी व्यवस्थाएं तत्काल पूरी करें।आयोग का यह रुख संकेत देता है कि वह निर्धारित समय पर चुनाव कराने के पक्ष में है और पंचायत पुनर्गठन की प्रक्रिया को चुनावी कैलेंडर में बाधा नहीं बनने देना चाहता।

वर्तमान स्थिति में राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग दो समानांतर दिशाओं में आगे बढ़ रहे हैं — सरकार पुनर्गठन पर केंद्रित है जबकि आयोग चुनावी तैयारी पर। ऐसे में यदि पुनर्गठन की प्रक्रिया लंबी खिंचती है, तो चुनाव कार्यक्रम आगे बढ़ाने या टालने की नौबत आ सकती है। यही वह बिंदु है जहाँ से राजनीतिक खींचतान की शुरुआत होने की संभावना है।

पंचायत पुनर्गठन हिमाचल सरकार के लिए केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से अहम दांव है। इससे ग्रामीण सत्ता संरचना में नए समीकरण बनेंगे और सत्ता पक्ष को राजनीतिक पुनर्संतुलन का अवसर मिल सकता है। वहीं, निर्वाचन आयोग इस प्रक्रिया में संवैधानिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए अपने रुख पर अडिग दिख रहा है।
आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पुनर्गठन और चुनावी तैयारी की यह दो समानांतर प्रक्रियाएं टकराती हैं या समन्वय की दिशा में बढ़ती हैं — क्योंकि इसका सीधा असर न केवल पंचायत चुनावों पर, बल्कि राज्य की जमीनी राजनीति के भविष्य पर भी पड़ेगा।

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