परिचय : जल संकट का गहराता आयाम
मानव सभ्यता की जड़ें जल पर टिकी हैं, और यह सत्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था। पृथ्वी पर जीवन का आधार जल है — किंतु विडंबना यह है कि जिसे हम सबसे अधिक आवश्यकता समझते हैं, उसी को सबसे अधिक दूषित कर रहे हैं। हमारे देश की अधिकांश आबादी अपनी पेयजल आवश्यकताओं के लिए भूजल पर निर्भर करती है। परंतु बीते कुछ वर्षों से इसकी गुणवत्ता में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है, जो मानवता के अस्तित्व के लिए गंभीर चेतावनी है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Ground Water Board – CGWB) द्वारा संचालित भूजल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के 2029 T0 2025 के आंकड़े इस दिशा में गहरी चिंता उत्पन्न करते हैं। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि अब यह केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। बढ़ते रासायनिक प्रदूषण, औद्योगिक गतिविधियों और गैर-जिम्मेदार जल उपयोग ने स्थिति को और भयावह बना दिया है — एक ऐसी स्थिति, जो दीर्घकाल में संपूर्ण मानवता के विनाश का कारण बन सकती है।
CGWB की भूमिका और अध्ययन का दायरा
भूजल की गुणवत्ता की वैज्ञानिक निगरानी की ज़िम्मेदारी केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) निभा रहा है, जो जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कार्यरत एक प्रमुख वैज्ञानिक एवं तकनीकी निकाय है। इसका कार्य भूजल संसाधनों का मूल्यांकन करना, उनके संरक्षण की रणनीतियाँ विकसित करना, और राज्यों को वैज्ञानिक परामर्श देना है। 2019 To 2025 में बोर्ड ने देशभर के प्रमुख राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से कुल 5,956 भूजल नमूने एकत्र किए, जिनमें आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, दिल्ली, दादरा एवं नगर हवेली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, नागालैंड, पंजाब, तेलंगाना और त्रिपुरा शामिल थे। इस विस्तृत अध्ययन का उद्देश्य पेयजल में सेलेनियम (Selenium) तत्व की उपस्थिति और उसके स्तर का आकलन करना था। यह तत्व भले ही सूक्ष्म पोषक तत्व के रूप में आवश्यक हो, किंतु इसकी मात्रा बढ़ने पर यह विष का कार्य करता है। इस शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि भूजल प्रदूषण का यह नया चेहरा मानव स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्ष खतरा बनता जा रहा है।
सेलेनियम : सूक्ष्म पोषक से घातक विष तक
सेलेनियम एक प्राकृतिक तत्व है जो पृथ्वी की परतों में पाया जाता है और पौधों एवं पशुओं के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व के रूप में आवश्यक होता है। किंतु यही तत्व जब भूजल में अधिक मात्रा में घुल जाता है, तो वह विनाशकारी सिद्ध होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों के अनुसार, पेयजल में सेलेनियम की अधिकतम सुरक्षित मात्रा 0.01 मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) होनी चाहिए। जब यह सीमा पार हो जाती है, तो मानव शरीर पर इसके दुष्प्रभाव गहराने लगते हैं। अत्यधिक सेलेनियम सेवन से “सेलेनोसिस” (Selenosis) नामक रोग होता है, जिसके लक्षणों में बाल और नाखूनों का झड़ना, त्वचा पर घाव, मांसपेशियों की दुर्बलता, तंत्रिका तंत्र की गड़बड़ी, और दीर्घकाल में यकृत एवं गुर्दे की क्षति शामिल हैं। यह केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है; इसका प्रभाव पशुओं और कृषि पर भी पड़ता है। सेलेनियम विषाक्तता मिट्टी की उर्वरता को कम करती है, जिससे कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार, यह प्रदूषण धीरे-धीरे संपूर्ण पारिस्थितिकी को नष्ट करने की दिशा में अग्रसर है।
प्रभावित राज्य, कारण और सरकारी प्रयास
2025 की CGWB रिपोर्ट बताती है कि हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में भूजल में सेलेनियम का स्तर सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक पाया गया है। इन राज्यों में औद्योगिक गतिविधियों का तीव्र विस्तार, खनन से उत्पन्न अपशिष्ट, और कृषि में रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने इस संकट को जन्म दिया है। हरियाणा और पंजाब जैसे कृषि प्रधान क्षेत्रों में जहां भूजल का अत्यधिक दोहन और रासायनिक खेती प्रचलित है, वहाँ यह समस्या और गहरी होती जा रही है।
भारत सरकार ने इस खतरे को भांपते हुए कई नीतिगत कदम उठाए हैं — अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana) के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी बढ़ाई जा रही है, राष्ट्रीय जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission) के तहत सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास जारी हैं, और नेशनल एक्विफर मैपिंग प्रोग्राम (NAQUIM) के अंतर्गत भूजल भंडारों का वैज्ञानिक मानचित्रण किया जा रहा है ताकि दूषित क्षेत्रों की पहचान और सुधार संभव हो सके। इसके अलावा राज्यों में जल गुणवत्ता प्रयोगशालाएँ (Water Quality Labs) स्थापित की जा रही हैं ताकि गाँव-गाँव में जल परीक्षण संभव हो। हालांकि इन प्रयासों के बावजूद वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब समाज स्वयं अपनी भूमिका समझे।
समाधान की दिशा : जनसहभागिता ही कुंजी
भूजल में सेलेनियम प्रदूषण जैसी चुनौती केवल सरकारी नीतियों या तकनीकी उपायों से समाप्त नहीं हो सकती। इसके लिए आवश्यक है कि समाज, वैज्ञानिक संस्थान, उद्योग और प्रशासन एक साथ मिलकर साझा जिम्मेदारी निभाएँ। जन-जागरूकता इस संकट से निपटने का सबसे प्रभावी साधन है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोतों के पास कचरा या रासायनिक अपशिष्ट न डालना, जैविक खेती को प्रोत्साहित करना, और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को अपनाना—ये कुछ कदम हैं जो बड़े स्तर पर परिवर्तन ला सकते हैं। स्कूलों, पंचायतों और स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से जल संरक्षण के संदेश को जन-जन तक पहुँचाना आज की आवश्यकता है। यदि समय रहते हमने अपने भूजल की रक्षा नहीं की, तो भविष्य की पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।
अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सेलेनियम प्रदूषण केवल एक रासायनिक समस्या नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व की परीक्षा है। यह वह बिंदु है जहाँ विज्ञान, नीति और नैतिकता – तीनों का संगम आवश्यक है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि जल केवल संसाधन नहीं, जीवन का सार है — और उसका संरक्षण हमारी सबसे बड़ी मानवीय जिम्मेदारी।
निष्कर्ष : मानवता के अस्तित्व की अंतिम चेतावनी
भूजल में सेलेनियम की बढ़ती मात्रा न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के लिए एक पर्यावरणीय आपदा का संकेत है। यह समस्या आने वाली पीढ़ियों के जीवन, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है। यह एक ऐसा मौन संकट है, जो यदि अनदेखा किया गया तो मानव सभ्यता के विनाश की कहानी लिख सकता है। अतः अब समय आ गया है कि हम “जल” को केवल संसाधन नहीं, बल्कि “जीवन” के रूप में समझें और उसकी शुद्धता को बनाए रखने के लिए समर्पित प्रयास करें। जब तक हम जल की पवित्रता की रक्षा नहीं करेंगे, तब तक मानवता की रक्षा असंभव है। यह चेतावनी नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा का निर्णय बिंदु है — क्योंकि जल बचेगा तभी जीवन बचेगा, और जीवन बचेगा तभी मानवता सुरक्षित रहेगी।

