
न्यूज़ इंडिया आजतक कार्यालय भरमाड , संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश का इतिहास ना सिर्फ बेहद समृद्ध है बल्कि संस्कृति और इसके महत्व से जुड़े स्थल आज भी उस भव्य युग की गवाही देते हैं।हिमाचल प्रदेश सिर्फ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती ही नहीं व्लकि पौराणिक चीजों और मंदिरों के लिए भी जाना जाता है हिमाचल प्रदेश के माता के मंदिरों की श्रृंखला में आपका परिचय कई ऐसे देवीयों के मंदिरों से करा रहा हूं जो दिव्य शक्तियों से ओतप्रोत हैं, चमत्कारिक अद्भुत है लेकिन कुछेक प्रसिद्ध व कुछेक अनसुने हैं या फिर कम लोग जानते हैं । अब मैं आप को जिला चंवा के भरमौर में स्थित माता भरमाणी (ब्रह्माणी)जो साक्षात् जगजननी माता दुर्गा का स्वरुप है माता भरमाणी को भगवान सदाशिव ने वरदान देकर विश्व में वंदनीय और पूजनीय कर दिया था । अपने दर्शन से पहले भरमाणी माता को महत्व दिया था ।
पवित्र मणिहेश यात्रा के विभिन्न पड़ाव अपने चमत्कारों के चलते इस यात्रा को अन्य यात्राओं से भिन्न करते हैं।देवभूमि हिमाचल में हजारों ऐसे मंदिर हैं जिनकी अपनी अलग ही महत्ता और पहचान है। चम्बा जिले के भरमौर में अगर आप शिव धाम चौरासी या मणिमहेश के दर्शन करना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको माता ब्रह्माणी अर्थात भरमाणी के दर्शन करना आवश्यक है।
ऐसी मान्यता है कि चौरासी मंदिर या मणिमहेश यात्रा से पहले माता ब्रह्माणी के दरबार में हाजिरी लगाना जरूरी है क्योंकि कभी ब्रह्मपुर के नाम से प्रख्यात भरमौर में ब्रह्मा जी की पुत्री ब्रह्माणी का वास हुआ करता था। भगवान भोलेनाथ ने माता ब्रह्माणी को यह वरदान दिया था कि जो भी व्यक्ति उनके दर्शनों के लिए मणिमहेश आएगा, वह पहले माता ब्रह्माणी के दर्शन करेगा, तभी उसकी यात्रा सफल होगी।भरमौर की पहाड़ियों के एक छोर पर डूग्गा सार नामक स्थान पर स्थापित माता ब्राह्मणी मंदिर के दर्शनार्थ के लिए यूं तो साल भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है लेकिन मणिमहेश यात्रा के दौरान तो यहां लोगों का तांता लग जाता है और लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है।
कहा जाता है कि माता ब्रह्माणी को नवदुर्गा में ब्रह्मचारिणी का रूप स्वीकारा गया है और माता ब्रह्माणी के नाम पर ही ब्रह्मपुर यानी भरमौर की स्थापना हुई थी मान्यता है कि इस पर्वतीय क्षेत्र भरमौर का पहले ब्रह्मपुर नाम हुआ करता था। इस दौरान माता भरमाणी का मंदिर भी चौरासी परिसर में ही था। चौरासी में ही माता का वास हुआ करता था। ऐसे में चौरासी परिसर में रात के समय पुरुषों के विश्राम को निषेध किया गया था। उस दौरान चौरासी सिद्धों का एक दल पवित्र मणिमहेश यात्रा पर जा रहा था। यात्रा पर आगे बढ़ने से पूर्व धीरे-धीरे अंधेरा होने लगा। ऐसे में चौरासी सिद्धों ने चौरासी में समतल स्थल होने की सूरत में रात यहीं पर ही रुकने का निर्णय लिया। जैसे चौरासी सिद्धों ने चौरासी परिसर में रात के समय प्रवेश किया तो इससे माता भरमाणी क्रोधित हो उठीं। माता भरमाणी उन चौरासी सिद्धों को श्राप देने लगी। तो चौरासी सिद्धों के मुखिया जोकि स्वयं भगवान शंकर थे आगे बढ़े। भगवान शंकर को देख माता भरमाणी का क्रोध शांत हो गया। माता भरमाणी ने भगवान शंकर से क्षमा मांगी। साथ ही चौरासी परिसर में रात के समय पुरुषों के आगमन निषेध होने की बात कही।
माता भरमाणी वहां से विलुप्त होकर डूगा सार नामक जगह पर प्रकट हुईं। जिसके बाद भगवान शंकर ने माता भरमाणी को वरदान दिया कि मणिमहेश यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा तभी पूर्ण होगी जब श्रद्धालु सर्वप्रथम माता भरमाणी के दर्शन करेंगे।
कैसे पहुंचें भरमणी माता मंदिर:रेलवे द्वारा:- निकटतम ब्रॉड गेज रेल प्रमुख पठानकोट है जो भरमौर से 164 किमी दूर है।स द्वारा:-चम्बा से 64 किमी दूर है। चंबा से टैक्सी और बसें उपलब्ध

