सिंचाई योजनाओं का दिवाला और भौगोलिक बाधाएँ बनीं किसानों की परीक्षा
कृषि: हिमाचल की जीवन-रेखा
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था की जड़ें उसकी मिट्टी में गहराई तक समाई हुई हैं। पहाड़ी राज्य होने के बावजूद यहाँ के लोगों ने खेती को न केवल आजीविका का साधन बनाया, बल्कि इसे अपनी संस्कृति और परंपरा का हिस्सा भी रखा है। राज्य की लगभग 71 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है और यह क्षेत्र राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 30 प्रतिशत योगदान देता है। यह आँकड़े यह दर्शाते हैं कि कृषि हिमाचल की आर्थिक रीढ़ है।किसान चाहे ऊँचे पर्वतीय इलाकों में रह रहे हों या घाटियों में, सबका जीवन खेतों और मौसम के उतार-चढ़ाव से जुड़ा हुआ है। यहाँ की मिट्टी से उपजने वाली हर फसल लोगों की मेहनत, धैर्य और उम्मीद का प्रतीक है। मगर बदलते समय के साथ खेती की चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं कभी वर्षा का अभाव, कभी बाजार का संकट, और अब सिंचाई की सीमाएँ किसानों की राह में बड़े अवरोध बन गए हैं।
हिमाचल प्रदेश में सिंचाई की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। सरकार ने कई योजनाएँ शुरू कीं जैसे सिंचाई नलकूप योजना, लघु सिंचाई परियोजनाएँ और नहर सुधार योजनाएँ, ताकि किसान वर्षा पर निर्भर न रहें। लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका असर सीमित ही रहा। कई योजनाएँ तकनीकी खामियों, भूमि विवादों या प्रशासनिक विलंब के कारण अधूरी रह गईं।वर्तमान में राज्य का सिंचित क्षेत्र लगभग 70 हजार हेक्टेयर ही है, जबकि कुल कृषि योग्य भूमि 9.40 लाख हेक्टेयर है। यानी लगभग 81 प्रतिशत खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है। पहाड़ी ढलानों पर खेती करने वाले किसान बारिश पर निर्भरता के कारण मौसम की अनिश्चितता से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं। कभी सूखा तो कभी अतिवृष्टि उनकी मेहनत पर पानी फेर देती है।ऐसे में यह ज़रूरी है कि सिंचाई योजनाओं को केवल कागज़ों पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतारा जाए। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, और छोटी-छोटी सिंचाई परियोजनाओं को गाँवों तक पहुँचाना आज की आवश्यकता है। अगर पानी खेत तक पहुँचेगा, तो किसानों की मेहनत भी फल देगी और राज्य की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
हिमाचल प्रदेश की कृषि की खासियत इसकी फसल विविधता है। यहाँ के अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों में अलग-अलग फसलें उगाई जाती हैं। कांगड़ा, मंडी और सिरमौर जिलों में गेहूँ, चावल और मक्का प्रमुख हैं, जबकि शिमला, कुल्लू और किन्नौर जैसे ठंडे क्षेत्रों ने सेब, कीवी, और सब्जियों की ऊँची गुणवत्ता वाली फसलों से अपनी पहचान बनाई है।राज्य सरकार ने खेती को लाभदायक और आधुनिक बनाने के लिए कई नई योजनाएँ शुरू की हैं। प्राकृतिक खेती खरोचक योजना के तहत किसानों को जैविक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे मिट्टी की सेहत भी बनी रहे और उत्पादन लागत भी घटे। डीबीटी प्रणाली (Direct Benefit Transfer) से किसानों तक सब्सिडी सीधे पहुँच रही है, जिससे भ्रष्टाचार और देरी दोनों में कमी आई है।इसके अलावा, ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर सिस्टम, पशुपालन, मधुमक्खी पालन और मत्स्य पालन को भी खेती से जोड़कर किसानों को बहु-आय वाला मॉडल अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इससे एक तरफ किसानों की आमदनी बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ युवाओं में भी खेती के प्रति रुचि लौट रही है। कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों द्वारा मिट्टी परीक्षण, फसल रोग नियंत्रण, और जल संरक्षण तकनीक पर किए जा रहे अध्ययन भविष्य की टिकाऊ खेती की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।
हालाँकि हिमाचल की कृषि ने कई सफलताएँ हासिल की हैं, लेकिन चुनौतियाँ अब भी बनी हुई हैं। राज्य का पर्वतीय भूगोल जहाँ सुंदरता का प्रतीक है, वहीं खेती के लिए बड़ी चुनौती भी है। यहाँ की भूमि छोटी-छोटी जोतों में बँटी हुई है — लगभग 89 प्रतिशत किसान सीमांत श्रेणी में आते हैं, जिनकी जोत एक हेक्टेयर से भी कम है। ऐसे में आधुनिक तकनीक और मशीनों का प्रयोग कठिन हो जाता है।इसके साथ ही, वन्यजीवों व आवारा पशुओं से फसलों को होने वाला नुकसान, और बाजार तक सीमित पहुँच किसानों की आय को प्रभावित करती है। बहुत-से गाँव ऐसे हैं जहाँ उत्पाद तो अच्छा होता है, पर उसे बेचने के लिए उचित व्यवस्था नहीं। ऐसे में सहकारी समितियों, ग्रामीण मंडियों और स्थानीय ब्रांडों की भूमिका अहम हो जाती है।राज्य सरकार “हिम-भोग” जैसे स्थानीय ब्रांडों के माध्यम से किसानों की उपज को पहचान दिलाने का प्रयास कर रही है। फसल बीमा योजनाएँ, तकनीकी परामर्श सेवाएँ, और डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए कृषि जानकारी की पहुँच बढ़ाना इस दिशा में सकारात्मक कदम हैं।भविष्य की राह स्पष्ट है — छोटी जोतों के सामूहिक उपयोग, सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई, और स्थानीय उत्पादों के मूल्य संवर्धन को प्राथमिकता देकर हिमाचल को आत्मनिर्भर कृषि राज्य बनाया जा सकता है।
न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स Mob:8894723376

