Reading: दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं —यह भारतीय आत्मा की शाश्वत ज्योति है,जो हर हृदय में “सत्य, धर्म और प्रकाश” के रूप में जलती रहती है।

दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं —यह भारतीय आत्मा की शाश्वत ज्योति है,जो हर हृदय में “सत्य, धर्म और प्रकाश” के रूप में जलती रहती है।

RamParkash Vats
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दीपावली विशेष:-संपादक राम प्रकाश की

भारतीय परंपरा, धर्म और समाज में प्रकाश का उत्सवभारत भूमि को यदि “त्योहारों की धरती” कहा जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहाँ के पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और जीवन-दर्शन का सजीव रूप हैं। इन्हीं में सबसे प्रमुख, सबसे लोकप्रिय और सर्वधर्म-सम्मत पर्व है — दीपावली, जिसे दीपोत्सव, प्रकाश पर्व और लक्ष्मी पूजन के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है।दीपावली की जड़ें इतिहास, पुराण, लोककथाओं और कृषि संस्कृति में गहराई से जुड़ी हैं। विभिन्न कालों में इसके अनेक प्रसंग मिलते हैं जो भारत की धार्मिक विविधता और समन्वय की भावना को प्रदर्शित करते हैं।

दीपावली का सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन प्रसंग त्रेतायुग के रामायण काल से जुड़ा है।कहा जाता है कि जब भगवान श्रीराम चौदह वर्षों का वनवास पूर्ण कर रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे, तो नगरवासियों ने दीपों से संपूर्ण अयोध्या को प्रकाशमान कर उनका स्वागत किया।उस दिन का वह आलोक पर्व ही आगे चलकर “दीपावली” कहलाया।यह प्रसंग केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक भी है।श्रीराम का आगमन अंधकार पर प्रकाश, अन्याय पर न्याय, और निराशा पर आशा की विजय का संदेश देता है।

द्वापर युग में दीपावली का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ा जाता है।कथा है कि श्रीकृष्ण ने असुर नरकासुर का वध किया, जिसने पृथ्वी पर अत्याचार और भय का वातावरण फैला रखा था।नरकासुर के वध के बाद पृथ्वी भयमुक्त हुई और उसी दिन नरक चतुर्दशी का उत्सव मनाया गया।अगले दिन जब श्रीकृष्ण द्वारका लौटे, तो नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया।इस प्रकार यह दिन अंधकार, पाप और भय के नाश का प्रतीक बन गया —जो आज भी दीपावली की पूर्व संध्या पर “छोटी दीपावली” के रूप में मनाया जाता है।

पुराणों के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने क्षीरसागर का मंथन किया, तब चौदह रत्नों के साथ माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ।वह कार्तिक अमावस्या की रात्रि थी, जब सम्पूर्ण सृष्टि में प्रकाश फैला।देवताओं ने दीप प्रज्वलित कर उनका स्वागत किया, और तभी से यह रात्रि “लक्ष्मी पूजन” के रूप में प्रतिष्ठित हुई।लक्ष्मी का यह अवतरण केवल धन-संपत्ति का नहीं, बल्कि शुभता, संतुलन और समृद्धि की भावना का प्रतीक है।

जैन परंपरा में दीपावली का अत्यंत विशेष महत्व है।इसी दिन भगवान महावीर स्वामी ने पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था।उनकी आत्मा ने कर्मबंधन से मुक्त होकर परम शांति पाई।जैन समाज इस दिन “आत्मा का प्रकाश” प्रज्वलित करने का संदेश देता है।दीपावली उनके लिए बाहरी दीपों से अधिक आंतरिक ज्ञान-ज्योति का प्रतीक है।

’सिख इतिहास में दीपावली को बंदी छोड़ दिवस के रूप में जाना जाता है।कहते हैं कि मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब को 52 अन्य राजाओं के साथ कैद किया था।जब गुरु जी रिहा हुए, तो उन्होंने सभी राजाओं को भी साथ लेकर स्वतंत्रता दिलाई।अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में उस दिन दीपों से पूरा नगर आलोकित किया गया।इसलिए सिख समुदाय के लिए दीपावली मुक्ति, साहस और न्याय का प्रतीक पर्व है।

एक अन्य दंतकथा के अनुसार, दैत्यराज बलि अत्यंत दानशील और पराक्रमी थे।उनके अभिमान को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया।तीन पग भूमि मांगकर वामन ने संपूर्ण ब्रह्मांड नाप लिया और बलि को पाताल लोक भेजा।देवताओं ने उस दिन दीप जलाकर उल्लास मनाया।यह प्रसंग दीपावली के अगले दिन मनाए जाने वाले “बलिप्रतिपदा” पर्व से संबंधित है।-

महाभारत काल में कहा जाता है कि जब पांडव अपना वनवास और अज्ञातवास पूर्ण कर हस्तिनापुर लौटे, तो नगरवासियों ने दीपों से उनका स्वागत किया।इस अवसर पर दीपावली को सत्य और धर्म की पुनर्स्थापना के रूप में देखा गया।यह प्रसंग भी दर्शाता है कि दीपावली केवल देवताओं का नहीं, बल्कि धर्मपरायण मानवता का भी पर्व है

इतिहास के पन्नों में एक और रोचक उल्लेख मिलता है —सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक भी दीपावली के दिन ही हुआ था।इसी दिन से “विक्रम संवत्” पंचांग का आरंभ माना जाता है।इससे यह स्पष्ट होता है कि दीपावली भारत की कालगणना, प्रशासन और शासन परंपरा से भी जुड़ी है।

भारत की अर्थव्यवस्था प्राचीन काल से ही कृषि और व्यापार पर आधारित रही है।दीपावली का यह पक्ष आर्थिक नववर्ष के रूप में महत्वपूर्ण है।किसान नई फसल के आने पर गोदामों और खेतों में दीप जलाते हैं।वहीं व्यापारी वर्ग इस दिन “चोपड़ा पूजन” कर नए खातों की शुरुआत करता है।यह शुभारंभ धन की देवी मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने का प्रतीक है।-

दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा होती है, जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र के अहंकार को तोड़ने और गोकुलवासियों की रक्षा के प्रतीक में मनाई जाती है।यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति की रक्षा और संतुलन ही सच्ची समृद्धि का मार्ग है।आज भी भारत के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व पशुधन, अन्न और धरती की पूजा के रूप में मनाया जाता है।-

दीपावली के अंतिम दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।कथा के अनुसार, यमराज अपनी बहन यमुना के घर भोजन करने गए थे।यमुना ने स्नेहपूर्वक उनका सत्कार किया।प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि इस दिन जो बहन अपने भाई को तिलक लगाकर भोजन कराएगी, उसके भाई को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।तब से यह दिन भाई–बहन के पवित्र प्रेम और सुरक्षा के वचन का प्रतीक बन गया।

इन विविध कथाओं से स्पष्ट होता है कि दीपावली धर्म, समाज, इतिहास और प्रकृति के सामंजस्य का पर्व है।हर युग और हर परंपरा ने इसे अपने अर्थ में अपनाया —कहीं यह राम का राज्याभिषेक है,कहीं लक्ष्मी का प्राकट्य,कहीं ज्ञान का आलोक,और कहीं बंधनों से मुक्ति का प्रतीक।दीपावली भारतीय संस्कृति की उस आत्मा का उत्सव है जो कहती है —> “तमसो मा ज्योतिर्गमय।”— अर्थात् अंधकार से प्रकाश की ओर चलो।

आज के युग में दीपावली केवल धार्मिक पर्व नहीं रही।यह परिवार, पर्यावरण, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गई है।हालाँकि आधुनिकता के प्रभाव से इसकी मूल आत्मा — संयम, शांति और प्रकाश का संतुलन — कहीं-कहीं धूमिल हो रही है।परंतु यदि हम दीपावली के इन प्राचीन दंतकथाओं का सार समझें, तो यह पर्व हमें याद दिलाता है किसच्चा प्रकाश भीतर से आता है,और वही प्रकाश पूरे समाज को आलोकित कर सकता है।—उपसंहारदीपावली का सांस्कृतिक इतिहास बताता है कि यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानवता का उत्सव है।यह वह क्षण है जब व्यक्ति, समाज और प्रकृति — तीनों एक सूत्र में बंध जाते हैं।

दीपावली हमें सिखाती है कि “हर अंधकार मिट सकता है, यदि एक दीप जलाया जाए।”इसी संदेश के साथ भारत सहस्राब्दियों से दीप जलाता आ रहा है —राम के लौटने पर, लक्ष्मी के प्राकट्य पर, महावीर के निर्वाण पर, गुरु हरगोबिंद की मुक्ति पर,और हर उस क्षण पर जब प्रकाश ने अंधकार को परास्त किया।

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