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सरकार की नीयत पर बरसे नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर — बोले, मंदिरों का पैसा धर्मार्थ कार्यों में ही खर्च हो, सरकार चलाने में नहीं

RamParkash Vats
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प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर मंदिर निधियों के इस्तेमाल को लेकर घमासान छिड़ गया है। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस सरकार जनता के हितों की आड़ में मंदिरों की धनराशि पर डाका डालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन अब उच्च न्यायालय द्वारा मंदिर निधियों को सरकार चलाने में खर्च करने पर रोक लगाने का निर्णय स्वागतयोग्य है।जयराम ठाकुर ने कहा कि भाजपा ने हमेशा यह स्पष्ट रुख अपनाया है कि मंदिरों की चढ़त और दान की राशि धर्मार्थ और धार्मिक कार्यों में ही खर्च होनी चाहिए, न कि सरकार के बजट घाटे को पूरा करने में। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार लंबे समय से मंदिरों के पैसों पर टेढ़ी नजर रखे हुए थी, और कभी किसी योजना के नाम पर तो कभी किसी कल्याणकारी योजना की आड़ में धार्मिक संपत्तियों पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रही थी।

नेता प्रतिपक्ष ने यह भी याद दिलाया कि इसी वर्ष 29 जनवरी को सरकार ने प्रदेश के सभी उपायुक्तों को निर्देश दिए थे कि मंदिर अपनी आय का हिस्सा सरकार के राजस्व में जमा करें, जिससे “सुखाश्रय” और “सुख शिक्षा” योजनाओं के लिए धन जुटाया जा सके। उन्होंने कहा कि यह कदम दरअसल सरकार की वित्तीय नाकामी को छिपाने का प्रयास था।जयराम ठाकुर ने कहा कि लोक कल्याण समिति की बैठक में यह तथ्य सामने आया कि सरकार द्वारा सुखाश्रय योजना के लिए आवंटित लगभग 88 करोड़ रुपये एफडी में डाले गए हैं, जबकि जिन जरूरतमंदों के नाम पर यह योजना शुरू की गई थी, उन्हें कोई ठोस राहत नहीं मिली। “जब सरकार के पास पहले से ही इतना बजट था, तो फिर मंदिरों से पैसा क्यों मांगा गया?” उन्होंने सवाल उठाया।

उन्होंने कहा कि भाजपा का स्पष्ट मत है कि मंदिर निधियां केवल धार्मिक, शैक्षणिक और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए ही इस्तेमाल की जाएं। यह राशि श्रद्धालुओं की सुविधा, गौ सेवा, और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में लगे — यही उसकी वास्तविक दिशा है।जयराम ठाकुर ने कटाक्ष करते हुए कहा कि “सरकार अब मंदिरों की कमाई से अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश न करे।” उन्होंने कहा कि भाजपा न केवल इस फैसले का स्वागत करती है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए आगे भी संघर्ष जारी रखेगी कि धर्मस्थलों का धन धर्म के कार्यों में ही समर्पित रहे, न कि सत्ता की योजनाओं के बोझ तले कुचल जाए।

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