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हिमाचल में माननीयों के वेतनवृद्धि पर संपादकीय चिंतन: क्या वास्तव में खजाना खाली है?

RamParkash Vats
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(संपादकीय मंथन, चिंतन और विश्लेषण)संपादक राम प्रकाश,

हिमाचल प्रदेश में माननीयों के वेतनवृद्धि पर संपादकीय चिंतन

हिमाचल प्रदेश में दिवाली के अवसर पर एक बार फिर से राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा का केंद्र बन गया है। राज्य सरकार ने मंत्रियों, विधायकों और पूर्व विधायकों के वेतन-भत्तों में 24 प्रतिशत की वृद्धि की अधिसूचना जारी कर दी है। इस निर्णय के तहत मुख्यमंत्री का मासिक वेतन और भत्ता अब 3.50 लाख रुपये, कैबिनेट मंत्रियों का 3.10 लाख रुपये, विधानसभा अध्यक्ष का 3.45 लाख रुपये, उपाध्यक्ष का 3.40 लाख रुपये और विधायकों का 2.80 लाख रुपये हो गया है। इसके साथ ही पूर्व विधायकों की पेंशन भी 1.29 लाख रुपये मासिक कर दी गई है।यह वृद्धि न केवल वित्तीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी गहरा है। राज्य के खजाने में उपलब्ध संसाधनों और जनता की वास्तविक जरूरतों के बीच यह संतुलन बनाने का अवसर है। हिमाचल प्रदेश में वर्षों से बेरोजगारी, अधूरी जनकल्याण योजनाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की कमियां, और ग्रामीण विकास के मुद्दे विधानसभा में चर्चा का विषय बने हुए हैं। कई मामलों में ये मुद्दे सालों तक लटकते रहते हैं, जबकि विधायकों और मंत्रियों के वेतन में वृद्धि के लिए प्रस्ताव तत्काल प्रभाव से पास हो जाता है।वेतन वृद्धि की यह प्रक्रिया एक ओर जहां विधायकों की आर्थिक स्थिति को स्थिर करने का कदम है, वहीं दूसरी ओर यह जनता की नजर में प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठाती है। क्या यह वेतन वृद्धि राज्य की वास्तविक जरूरतों और जनता के हितों के अनुरूप है? क्या इससे बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने और जनकल्याण योजनाओं के कार्यान्वयन में मदद मिलेगी? इन सवालों का जवाब शायद ही संतोषजनक हो। विधानसभा सचिवालय और विधि विभाग की प्रक्रिया भी इस विषय में महत्वपूर्ण है। इस साल विधानसभा के बजट सत्र में तीनों विधेयक—माननीयों के वेतन, भत्ते और पूर्व विधायकों की पेंशन बढ़ाने के—ध्वनिमत से पारित किए गए थे। इसके बाद इन्हें राजपत्र में प्रकाशित कर सामान्य प्रशासन विभाग को औपचारिकताएं पूरी करने के लिए भेजा गया। हालांकि मंत्रियों और विधायकों के वेतन में मामूली अंतर को लेकर कुछ समय तक विवाद भी रहा, जिसे संबंधित विभागों ने मिलकर सुलझा लिया।नई अधिसूचना के अनुसार, विधायक का बेसिक वेतन 55 हजार रुपये से बढ़ाकर 70 हजार रुपये कर दिया गया है। कार्यालय भत्ता 30 हजार से बढ़कर 90 हजार और विधानसभा क्षेत्र भत्ता 90 हजार से बढ़ाकर 1.20 लाख रुपये मासिक कर दिया गया है। प्रतिपूरक भत्ता फिलहाल पांच हजार रुपये ही रहेगा। इसके साथ ही टेलीफोन भत्ते और बिजली-पानी बिल भत्ते जैसी सुविधाएं समाप्त कर दी गई हैं। पूर्व विधायकों की पेंशन में भी महंगाई भत्ते को शामिल करते हुए कुल राशि बढ़ाई गई है।इस वेतन वृद्धि के पीछे सरकार की तर्कपूर्ण व्याख्या यह है कि यह कदम महंगाई और जीवनयापन लागत के अनुपात में आवश्यक है। प्राइस इंडेक्स के आधार पर पांच साल में स्वतः वृद्धि का प्रावधान इसे और व्यवस्थित बनाता है। हालांकि यह तथ्य गंभीर वित्तीय जिम्मेदारी के संकेत देता है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या राज्य की प्राथमिकताएं भी इसी तरह व्यवस्थित हैं।हिमाचल प्रदेश में बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दे वर्षों से असंतुलित स्थिति में हैं। भाजपा और कांग्रेस अपने शासन काल में खजाने की सीमाओं का रोना रोते रहे हैं। लेकिन जब विधायकों के वेतन बढ़ाने की बात आती है, तो न केवल विधेयक पास हो जाता है, बल्कि इसे तुरंत लागू कर दिया जाता है। यह विडंबना जनता के बीच यह धारणा पैदा करती है कि राजनीतिक वर्ग अपनी आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।वित्तीय बोझ की दृष्टि से यह वृद्धि राज्य के लिए सालाना लगभग 20 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च उत्पन्न करेगी। यह राशि उन क्षेत्रों में निवेश की जा सकती थी, जहां रोजगार सृजन, शिक्षा सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और ग्रामीण विकास की वास्तविक जरूरत है। जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप प्राथमिकता तय करना ही किसी भी सरकार की असली जिम्मेदारी होती है।समाज और राजनीति के दृष्टिकोण से यह मामला गहन चिंतन का विषय है। क्या विधायकों और मंत्रियों का वेतन वृद्धि करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए, या जनता के मूलभूत अधिकारों और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना अधिक जरूरी है? यह सवाल राजनीतिक और प्रशासनिक सोच का प्रतिबिंब है।इतिहास भी हमें यही सिखाता है कि जब नीति निर्माण और वित्तीय निर्णय केवल प्रतिनिधियों की सुविधा के लिए किए जाते हैं, तो जनता के विश्वास में कमी आती है। हिमाचल प्रदेश में नीति निर्धारण में संतुलन और जवाबदेही आवश्यक है। जनता की अपेक्षाओं और प्रतिनिधियों के आर्थिक हित के बीच सामंजस्य स्थापित करना ही स्थिर और विकासशील शासन का आधार है।वास्तव में, वेतन वृद्धि के कदम को पूर्ण रूप से नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। यह विधायकों को महंगाई और जीवन स्तर के हिसाब से आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। लेकिन इसकी समयबद्धता, प्राथमिकताएं और राज्य की दीर्घकालिक विकास योजनाओं के साथ संतुलन, इसे आलोचना के घेरे में लाती हैं।समग्र विश्लेषण यह दर्शाता है कि हिमाचल प्रदेश को नीति निर्माण और वित्तीय प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता, संतुलन और जवाबदेही की आवश्यकता है। केवल अपने प्रतिनिधियों के हित में निर्णय लेना, जनता के विकास और कल्याण की प्राथमिकताओं के साथ मेल नहीं खाता। हिमाचल को चाहिए कि भविष्य में ऐसी नीतियां बनाएं जो वेतन और पेंशन सुरक्षा के साथ-साथ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में भी सुधार सुनिश्चित करें।वेतनवृद्धि के फैसले ने राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से एक संदेश तो दिया है, लेकिन यह जनता के नजरिए से सोचने का विषय भी बन गया है। हिमाचल प्रदेश में संतुलित विकास, जवाबदेह शासन और प्राथमिकताओं का सही निर्धारण ही राज्य की स्थिरता और जनता के विश्वास का आधार बनेगा।

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