“हिमाचल के पास सब कुछ है: जल में ऊर्जा, वन में औषधि, मिट्टी में जीवन, और युवाओं में संभावनाएँ। केवल आवश्यकता है समन्वित नीति, दूरदृष्टि और सामूहिक संकल्प की। जब शासन, समाज और पर्यावरण एक दिशा में चलेंगे — तभी ‘हरित, स्वावलंबी और समृद्ध हिमाचल’ का सपना साकार होगा।”
वास्तव में हिमाचल के पास वह सब कुछ है जो एक समृद्ध समाज की नींव बन सकता है — जल में ऊर्जा का प्रवाह, वनों में औषधि का भंडार, मिट्टी में जीवन की उर्वरता और युवाओं में परिवर्तन की शक्ति। बस आवश्यकता है एक समन्वित नीति, दूरदृष्टि और सामूहिक संकल्प की। जब शासन, समाज और पर्यावरण एक सूत्र में बंधकर आगे बढ़ेंगे, तभी हरित, स्वावलंबी और समृद्ध हिमाचल का स्वप्न वास्तविकता बनेगा।”
सरकार को अब एक दीर्घकालिक “हिमाचल विजन 2047” नीति तैयार करनी चाहिए, जिसमें सभी दलों और समाज के वर्गों की सहभागिता हो। जल स्रोतों की रक्षा, वनों की पुनर्स्थापना, स्थानीय उद्योगों का संवर्धन और तकनीकी नवाचार — यही चार स्तंभ हिमाचल के आत्मनिर्भर भविष्य की नींव बन सकते हैं।
हिमाचल प्रदेश भारत का वह पर्वतीय राज्य है, जिसे प्रकृति ने अनुपम सौंदर्य और असीम संपदा से नवाज़ा है। बर्फ से ढकी चोटियाँ, नदियों का निर्मल प्रवाह, जैव विविधता से समृद्ध वन क्षेत्र, और शांत ग्राम्य जीवन — ये सब हिमाचल को “देवभूमि” का दर्जा दिलाते हैं। परंतु यह भी एक सच्चाई है कि इतनी संपन्न प्राकृतिक धरोहर के बावजूद प्रदेश आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। राज्य के वित्तीय ढांचे का अधिकांश हिस्सा केंद्र की सहायता या ऋण पर निर्भर है। बेरोज़गारी बढ़ रही है, युवाओं का पलायन तेज़ है, और संसाधनों का उपयोग अब भी पारंपरिक और सीमित दायरे में है। यह विडंबना इस ओर संकेत करती है कि हिमाचल की विकास नीतियाँ अभी तक उसकी प्राकृतिक और मानव संपदा के अनुरूप नहीं बन पाई हैं।हिमाचल के पास जल, वन, खनिज और पर्यटन जैसे अनेक क्षेत्र हैं, जो प्रदेश को समृद्ध बना सकते हैं। राज्य में लगभग 37,000 मेगावाट की जलविद्युत क्षमता विद्यमान है, लेकिन वर्तमान में मात्र 11,000 मेगावाट का ही उपयोग हो पा रहा है। वनों से प्राप्त लकड़ी, औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियाँ यदि मूल्य संवर्धन के साथ प्रसंस्कृत की जाएँ, तो ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बना सकते हैं। कृषि में भी प्रदेश के पास जैविक खेती, फल उत्पादन और फूलों की खेती जैसी विशेषताएँ हैं, जो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में हिमाचल को पहचान दिला सकती हैं।पर्यटन के क्षेत्र में हिमाचल की क्षमता अद्वितीय है। हर वर्ष करोड़ों पर्यटक यहाँ आते हैं, किंतु यह पर्यटन मुख्यतः सीमित भौगोलिक क्षेत्रों — शिमला, मनाली, धर्मशाला या कुल्लू तक सीमित रह जाता है। यदि राज्य अपने ईको-टूरिज़्म, होमस्टे संस्कृति, साहसिक खेलों और धार्मिक स्थलों को योजनाबद्ध ढंग से जोड़े, तो हिमाचल के हर कोने में विकास का नया द्वार खुल सकता है। अधूरी योजनाओं का दायरा:प्रदेश सरकारों ने समय-समय पर अनेक योजनाएँ शुरू कीं — ग्रीन स्टेट मिशन, हाइड्रो पावर नीति, पर्यटन विकास योजना, और जल संरक्षण अभियान। परंतु इन योजनाओं का धरातलीय असर अपेक्षानुसार नहीं दिखा। नीतिगत असंगति, धीमी प्रशासनिक प्रक्रिया और स्थानीय स्तर पर सहभागिता की कमी ने योजनाओं को अधूरा छोड़ दिया।जलविद्युत क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है — निजी कंपनियाँ और केंद्रीय एजेंसियाँ परियोजनाएँ संचालित कर रही हैं, जबकि राज्य को केवल सीमित रॉयल्टी प्राप्त होती है। इससे लाभ का बड़ा हिस्सा प्रदेश से बाहर चला जाता है। यह स्थिति दर्शाती है कि हिमाचल अभी भी अपने संसाधनों का “मालिक” होते हुए भी “उपभोक्ता” बनकर रह गया है। शासन की प्राथमिकता को अब केवल घोषणाओं से आगे बढ़ाकर ठोस आर्थिक और पर्यावरणीय परिणामों पर केंद्रित करना होगा।विकास की दौड़ में हिमाचल कई बार अपने ही पर्यावरणीय संतुलन से समझौता कर बैठा है। अनियोजित सड़क निर्माण, अंधाधुंध खनन, और बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स ने पहाड़ी भूभाग को अस्थिर बना दिया है। हर साल मानसून में भूस्खलन और बाढ़ से होने वाली तबाही यह संकेत देती है कि हम विकास और संरक्षण के बीच सामंजस्य नहीं बना पाए हैं।वनों की कटाई और नदियों के किनारे कंक्रीट निर्माण ने स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाया है। गाँवों का विस्थापन और पारंपरिक जीवनशैली का विघटन भी इसी असंतुलन का परिणाम है। अब आवश्यकता इस बात की है कि विकास को केवल जीडीपी या परियोजना संख्या से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय स्थायित्व से भी आँका जाए। सतत विकास के सिद्धांत को हिमाचल के हर नीति निर्णय का आधार बनाना होगा।प्रदेश का वार्षिक बजट लगभग 60,000 करोड़ रुपये है, परंतु अपनी आय का हिस्सा केवल 30 प्रतिशत के आसपास है। शेष केंद्र की सहायता या ऋण से प्राप्त होता है। यह आर्थिक असंतुलन बताता है कि हिमाचल अपनी “आंतरिक आय सृजन क्षमता” का उपयोग नहीं कर पा रहा है। यदि जल, वन और पर्यटन संसाधनों का सुव्यवस्थित दोहन किया जाए, तो राज्य न केवल ऋण-मुक्त हो सकता है बल्कि “आत्मनिर्भर हिमाचल” की दिशा में अग्रसर हो सकता है।राज्य के युवाओं में उद्यमिता की भावना प्रबल है, लेकिन उन्हें पूंजी, प्रशिक्षण और बाज़ार से जोड़ने की नीति अभी भी कमजोर है। “वन आधारित उद्योग”, “औषधीय प्रसंस्करण इकाइयाँ” और “स्थानीय उत्पाद ब्रांडिंग” जैसी पहलें यदि पंचायत स्तर तक पहुँचें, तो हिमाचल का आर्थिक ढांचा नई दिशा पा सकता है।हिमाचल की साक्षरता दर 83 प्रतिशत से अधिक है, जो राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। बावजूद इसके, शिक्षित युवा रोजगार के लिए अन्य राज्यों या विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। यह “मानव संसाधन का क्षरण” है। सरकार को चाहिए कि वह शिक्षा प्रणाली को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़े। उदाहरणतः — कृषि विश्वविद्यालयों को जैविक खेती और औषधीय पौधों के उद्यम से, तकनीकी संस्थानों को हाइड्रो और सौर परियोजनाओं से, तथा पर्यटन पाठ्यक्रमों को ईको-टूरिज़्म उद्योग से जोड़ा जाए।साथ ही, कौशल विकास योजनाओं को केवल प्रमाण पत्र तक सीमित न रखकर, उत्पादन और विपणन श्रृंखला से जोड़ना होगा। तभी युवाओं को स्वावलंबन का वास्तविक अवसर मिलेगा और पलायन रुकेगा।हिमाचल की प्रगति की कुंजी है पर्यावरणीय संतुलन, स्थानीय सहभागिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का समन्वय। हाल के वर्षों में सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, और होमस्टे नीति जैसी पहलें आशा की किरण हैं। यदि इन्हें प्रशासनिक पारदर्शिता और जनता की भागीदारी के साथ जोड़ा जाए, तो हिमाचल “सस्टेनेबल डेवलपमेंट मॉडल” के रूप में उभर सकता है।सरकार को अब एक दीर्घकालिक “हिमाचल विजन 2047” नीति तैयार करनी चाहिए, जिसमें सभी दलों और समाज के वर्गों की सहभागिता हो। जल स्रोतों की रक्षा, वनों की पुनर्स्थापना, स्थानीय उद्योगों का संवर्धन और तकनीकी नवाचार — यही चार स्तंभ हिमाचल के आत्मनिर्भर भविष्य की नींव बन सकते हैं।अंततः, यह प्रदेश केवल अपने पर्वतों और नदियों के सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि अपने संतुलित विकास दृष्टिकोण से भी पहचाना जाए — यही सच्चा हिमाचल होगा, जो प्रकृति की गोद में रहते हुए आधुनिकता की ओर संतुलित गति से अग्रसर होगा।
मेरा संपादकीय दृष्टिकोण वास्तव में हिमाचल प्रदेश के पास वह सब कुछ है जो एक आत्मनिर्भर और समृद्ध समाज की नींव रख सकता है — जल में ऊर्जा का प्रवाह, वनों में औषधि का भंडार, मिट्टी में जीवन की उर्वरता, और युवाओं में नवाचार की असीम शक्ति।फिर भी यह क्षमता तभी सार्थक होगी जब नीति-निर्माण में दूरदृष्टि, शासन में पारदर्शिता और समाज में सामूहिक जिम्मेदारी का समन्वय हो।हिमाचल के भविष्य की दिशा केवल बजट या योजनाओं से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से होगी कि राज्य अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उपयोग के बीच कितना संतुलन स्थापित कर पाता है।शासन, समाज और पर्यावरण — ये तीनों जब एक सूत्र में बंधकर एक ही दिशा में आगे बढ़ेंगे, तभी “हरित, स्वावलंबी और समृद्ध हिमाचल” का स्वप्न वास्तविकता बनेगा।यह समय है जब आलोचना नहीं, बल्कि सकारात्मक चिंतन और सामूहिक प्रयास हिमाचल के विकास पथ को नई ऊँचाइयों पर ले जाएं।
न्यूज़ इंडिया आजतक कार्यालय भरमाड , संपादक राम प्रकाश वत्स
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