Reading: हिमाचल प्रदेश में होमगार्ड कर्मचारी वर्षों से पुलिस विभाग के साथ हर मुश्किल में कंधे से कंधा मिलाकर ड्यूटी करते हैं। बावजूद इसके, 7 दशकों से इनके अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

हिमाचल प्रदेश में होमगार्ड कर्मचारी वर्षों से पुलिस विभाग के साथ हर मुश्किल में कंधे से कंधा मिलाकर ड्यूटी करते हैं। बावजूद इसके, 7 दशकों से इनके अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

RamParkash Vats
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जोगिंदर सिंह ने कहा, “स्वतंत्रता संग्राम में आजाद हिंद फौज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े हमारे जवान आज भी शोषित हैं। उन्हें स्थायी सेवा, नियमित वेतन और सरकारी सुविधाओं में समान अधिकार नहीं मिले। न्याय मिलने में हो रही देरी भी अन्याय के बराबर है। कई जवान अपनी मेहनत की कमाई या संपत्ति तक बेचने को मजबूर हैं।”

स्थायी कर्मचारियों का कहना है कि उनकी नौकरी की स्थिति इतनी कठिन है कि कई जवानों को परिवार और जीवन यापन में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। “जब नौकरी से हम निकले, दिल में कुछ अरमान थे, नौकरी सारी उम्र की, ना मिला आखिर सहारा कोई।” ये शब्द केवल भावनाओं का प्रदर्शन नहीं हैं, बल्कि दशकों की उपेक्षा और अनिश्चितता का वास्तविक चित्र हैं।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, होमगार्ड कर्मचारियों का वेतन और सेवा परिस्थितियाँ अन्य सरकारी विभागों की तुलना में बहुत कम हैं। उन्हें न केवल नियमित वेतन और पदोन्नति में समानता नहीं दी जाती, बल्कि स्वास्थ्य, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं में भी समान अधिकार नहीं मिलते। कई कर्मचारी बताते हैं कि उनकी ड्यूटी पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों के समान होती है, लेकिन सुविधाओं और मान्यता में असमानता बरती जाती है।

जोगिंदर सिंह ने कहा कि लगातार लंबे समय से विभागीय अधिकारियों और प्रशासनिक तंत्र से न्याय की मांग की जा रही है। कई मामलों में कानूनी रास्ता अपनाना पड़ा, लेकिन न्याय पाने की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल है कि अक्सर मामलों की तारीख बार-बार बढ़ जाती है। “मुकदमों में देरी के कारण जवानों की जिंदगी पर सीधा असर पड़ता है। कई तो अपनी संपत्ति तक बेचने को मजबूर हो गए हैं ताकि न्याय की लड़ाई जारी रख सकें। यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि राज्य की सुरक्षा व्यवस्था में योगदान देने वाले कर्मचारियों के प्रति अपमानजनक भी है।”

अधिकारों और वेतन में असमानता के चलते कई होमगार्ड कर्मचारियों ने भविष्य के लिए निराशा व्यक्त की है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सेवा का सम्मान न मिलने के कारण नए युवाओं को भी इस सेवा में आने में हिचकिचाहट हो रही है। “हमारे जवानों की मेहनत और योगदान को नजरअंदाज कर दिया गया है। इससे न केवल वर्तमान कर्मचारी प्रभावित होते हैं, बल्कि भविष्य में सुरक्षा तंत्र में भी असर पड़ेगा।”

हिमाचल प्रदेश होमगार्ड वेलफेयर एसोसिएशन लगातार प्रशासन और सरकार के सामने यह मांग रख रही है कि होमगार्ड कर्मचारियों को स्थायी सेवा, नियमित वेतन, पेंशन और अन्य सरकारी सुविधाओं में समान अधिकार दिया जाए। जोगिंदर सिंह ने कहा कि सरकार को चाहिए कि वे लंबित मुद्दों को प्राथमिकता दें और कर्मचारियों के संघर्ष को हल करने के लिए ठोस कदम उठाएं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि जवानों की मेहनत और बलिदान को सम्मान और कानूनी सुरक्षा मिले।

हिमाचल प्रदेश में होमगार्ड का योगदान केवल पुलिस सहायता तक सीमित नहीं है। ये जवान प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़, भूकंप और महामारी जैसी आपात स्थितियों में भी लगातार तत्पर रहते हैं। इसके बावजूद सात दशकों से स्थायी कर्मचारी अनिश्चितता और अन्याय की चक्की में पीस रहे हैं। उनके संघर्ष की कहानी केवल व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि यह राज्य की सुरक्षा तंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही और संवैधानिक न्याय की अहमियत को भी दर्शाती है।स्थानीय विशेषज्ञों का कहना है कि यदि प्रशासन और सरकार ने समय रहते इन कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान नहीं किया, तो यह केवल कर्मचारियों के लिए ही नहीं बल्कि राज्य की सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी चिंताजनक स्थिति पैदा कर सकता है। होमगार्ड कर्मचारियों की उपेक्षा, असमान待遇 और न्याय की लंबी प्रक्रिया राज्य की प्रशासनिक दक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।

हिमाचल प्रदेश होमगार्ड का इतिहास 1962 से लेकर आज तक राज्य की सुरक्षा और आंतरिक व्यवस्था में योगदान देने की लंबी कहानी है। इसके बावजूद, स्थायी कर्मचारी आज भी न्याय और समानता की प्रतीक्षा में हैं। उनकी कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और संवैधानिक न्याय की मांग की भी है।

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