जनहित योजनाओं का अधूरा सपना : व्यवस्था की जड़ में राजनीतिक दिखावा-सामूहिक जनहित योजनाएं तभी “जनहित” कहलाएंगी जब उनमें जनता की भागीदारी वास्तविक होगी
योजनाओं के नाम पर फर्जी लाभार्थी सूची तैयार की जाती है, काम बिना कार्यस्थल पर पहुंचे ही “पूर्ण” दिखा दिए जाते हैं, और मजदूरी के बिल “कागजी मजदूरों” के नाम पर बनते हैं। जबकि कुछेक पंचायतों ने अपनी पंचायतों को भरपूर मनरेगा का लाभ दिया है।
अनियमितताओं के जवाब में सरकार ने “ई-केवाईसी” और “मैं भी जिंदा हूं” (I am alive) जैसे डिजिटल सत्यापन अभियान शुरू किए।
हिमाचल प्रदेश में सामूहिक जनहित योजनाओं का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही उनका अधूरा रह जाना भी सामान्य हो गया है। चाहे वह ग्रामीण सड़कों का निर्माण हो, पेयजल योजनाएं, प्रधानमंत्री आवास योजना हो या मनरेगा — अधिकतर योजनाएं कागजों में “पूर्ण” दिखाई जाती हैं, लेकिन धरातल पर उनका अस्तित्व खो जाता है। इसका मूल कारण है योजनाओं का राजनीतिक दिखावे में बदल जाना। पंचायत स्तर पर विकास योजनाएं “जनभागीदारी” की बजाय “जन-प्रदर्शन” बनकर रह गई हैं। हर नई सरकार, हर नया पंचायत प्रधान, अपनी छवि चमकाने के लिए योजनाओं का नया उद्घाटन तो करता है, लेकिन पूर्ववर्ती योजनाओं का रखरखाव या समीक्षा शायद ही कभी होती है।सत्ता परिवर्तन के साथ योजनाएं बदलती हैं, प्राथमिकताएं बदलती हैं, और बीच में फंस जाता है जनता का हक़। “साझा हित” की योजनाएं व्यक्तिगत स्वार्थों की बलि चढ़ जाती हैं। परिणामस्वरूप, सामूहिक विकास का सपना, राजनीति और प्रशासनिक लापरवाही के बीच दम तोड़ देता है।
पंचायतों का दिवाला : फर्जीवाड़े और भाई-भतीजावाद का खेल:पंचायत स्तर पर योजनाओं का असफल होना हिमाचल के ग्रामीण तंत्र की एक बड़ी बीमारी है। पंचायतें, जो लोकतंत्र की सबसे निचली और मजबूत इकाई मानी जाती हैं, कुछेक पंचायतें अब भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का अड्डा बनती जा रही हैं। योजनाओं के नाम पर फर्जी लाभार्थी सूची तैयार की जाती है, काम बिना कार्यस्थल पर पहुंचे ही “पूर्ण” दिखा दिए जाते हैं, और मजदूरी के बिल “कागजी मजदूरों” के नाम पर बनते हैं। जबकि कुछेक पंचायतों ने अपनी पंचायतों को भरपूर मनरेगा का लाभ दिया है।यह फर्जीवाड़ा सिर्फ धन की बर्बादी नहीं, बल्कि जनविश्वास का ह्रास है। कई पंचायतों में विकास कार्यों की प्राथमिकता का निर्धारण राजनीतिक झुकाव या व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर होता है। गरीब, वृद्ध या तकनीकी रूप से अक्षम व्यक्ति योजना की जटिल प्रक्रिया में खो जाता है। ग्राम सभा की बैठकों में जो निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए, वे अक्सर कुछ प्रभावशाली लोगों की “मुट्ठी” में सीमित रह जाते हैं। परिणाम — पंचायत स्तर पर विकास का दिवाला निकल जाता है और योजनाएं कागजों में “सफलता” के तमगे पाती रहती हैं।
. मनरेगा : पारदर्शिता के नाम पर मनमानी: मनरेगा, जिसे ग्रामीण भारत की आर्थिक रीढ़ कहा जाता है, हिमाचल प्रदेश में भी हजारों परिवारों के लिए जीवनरेखा रही है। लेकिन इसी योजना ने भ्रष्टाचार की जड़ें भी गहरी की हैं। सरकार के अनुसार, राज्य में लाखों मजदूर पंजीकृत हैं, परंतु इन आंकड़ों में फर्जी जॉब कार्ड, मृत व्यक्तियों के नाम पर भुगतान और दोहराए गए पंजीकरण की बड़ी संख्या है।इन अनियमितताओं के जवाब में सरकार ने “ई-केवाईसी” और “मैं भी जिंदा हूं”(I am alive) जैसे डिजिटल सत्यापन अभियान शुरू किए। परंत यह प्रयास जितना तकनीकी रूप से सशक्त दिखता है, उतना ही सामाजिक रूप से असंवेदनशील भी साबित हो रहा है। वह मजदूर जो रोज़ अपनी जीविका के लिए मनरेगा स्थल पर पसीना बहाता है, उसे अब यह साबित करना पड़ रहा है कि वह “जिंदा” है।तकनीकी समाधान की आड़ में असली समस्या — पंचायत स्तर पर निरीक्षण, पारदर्शी ऑडिट और जवाबदेही की कमी — को दरकिनार कर दिया गया है। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की प्रक्रिया, अब मजदूरों के लिए नई डिजिटल दीवार बन गई है। नेटवर्क, स्मार्टफोन और इंटरनेट की कमी वाले पहाड़ी इलाकों में यह व्यवस्था और भी दुष्कर साबित हो रही है।
सिस्टम की गड़बड़ी : सुधार के नाम पर नई कठिनाइयां:सवाल यह है कि जब भ्रष्टाचार का स्रोत ऊपर से नीचे तक फैला हुआ है, तो उसका बोझ सबसे नीचे – यानी मजदूर -पर क्यों डाला जा रहा है? क्या फर्जीवाड़े के असली जिम्मेदार वे मजदूर हैं, या वे पंचायत अधिकारी जो उनके नाम पर भुगतान निकालते हैं? हकीकत यह है कि डिजिटल व्यवस्था लागू करने से पहले उसके लिए आवश्यक आधारभूत ढांचे पर कोई गंभीर ध्यान नहीं दिया गया। कई ग्राम रोजगार सेवकों को स्वयं मोबाइल एप चलाना नहीं आता। कई पंचायतों में नेटवर्क न होने के कारण डेटा अपलोड नहीं हो पाता। मजदूरों को घंटों पंचायत कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, सिर्फ इसलिए कि सिस्टम “चेहरा नहीं पहचान सका”।इन परिस्थितियों में ई-केवाईसी जैसी प्रक्रिया, पारदर्शिता की बजाय अपमानजनक औपचारिकता बन गई है। सरकार का मकसद यदि व्यवस्था सुधारना है, तो उसे तकनीक को “सहायक उपकरण” बनाना चाहिए, “निर्णायक कसौटी” नहीं।
. समाधान की राह : पारदर्शिता, संवेदनशीलता और जनभागीदारी का संगम:हिमाचल की जनहित योजनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए सबसे पहले पंचायत स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी। प्रत्येक योजना का वार्षिक सामाजिक ऑडिट अनिवार्य हो, और ग्राम सभा को उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत की जाए। ग्राम रोजगार सेवकों और पंचायत सचिवों के प्रशिक्षण के साथ-साथ, डिजिटल सहायता केंद्रों की स्थापना की जाए ताकि ग्रामीण मजदूर तकनीकी प्रक्रिया से भयभीत न हों।
मनरेगा के लिए, चरणबद्ध ई-केवाईसी प्रणाली लागू हो : पहले नए मजदूरों पर, फिर पुराने पंजीकृतों पर। जिन क्षेत्रों में नेटवर्क नहीं है, वहां ऑफलाइन सत्यापन के विकल्प हों। सबसे महत्वपूर्ण, योजना के नाम और प्रचार में संवेदनशीलता बरती जाए — “मैं भी जिंदा हूं” (I am alive) जैसे शब्द गरीबों की गरिमा का मजाक उड़ाते हैं।सामूहिक जनहित योजनाएं तभी “जनहित” कहलाएंगी जब उनमें जनता की भागीदारी वास्तविक होगी, न कि केवल “कागजी”। सरकारों को याद रखना चाहिए — तकनीक पारदर्शिता का साधन है, लेकिन संवेदना ही लोकतंत्र की आत्मा है।
सारगर्भित है कि विकास का चेहरा तभी सच्चा होगा जब गरीब की आवाज़ सुनी जाएगी हिमाचल की पहाड़ियों में वह मजदूर आज दोहरी लड़ाई लड़ रहा है — एक ओर पेट के लिए, दूसरी ओर पहचान के लिए। सामूहिक योजनाओं की आत्मा अब आंकड़ों और ऐप्स में कैद हो गई है।यदि सरकार वास्तव में चाहती है कि योजनाएं समय से पहले “दम न तोड़ें”, तो उसे नीतियों के केंद्र में “मानव” को रखना होगा, “मशीन” को नहीं।विकास का अर्थ तभी सार्थक होगा जब हर मजदूर यह कह सके — (I am not just alive, I am alive with dignity)“मैं सिर्फ जिंदा नहीं , सम्मानपूर्वक जिंदा हूं।”

