संपादकीय चिंतन ,मंथन और विश्लेषण-न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स
“जल-संरक्षण: हिमाचल की जीवनरेखा”:हिमाचल प्रदेश की धरती को प्रकृति ने असीम जल संपदा का आशीर्वाद दिया है। बर्फ से लदी चोटियाँ, झरनों से बहती धाराएँ और नदियों का निरंतर प्रवाह — ये सब मिलकर हिमाचल को जीवन देने वाली धारा बनाते हैं। परंतु विडंबना यह है कि आज यही जलस्रोत धीरे-धीरे सूखते जा रहे हैं। कभी जो पहाड़ी गाँव झरनों के संगीत से गूंजते थे, आज वहाँ पानी की एक बूंद के लिए भी त्राहि-त्राहि मची है। जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित निर्माण, और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने इस प्रदेश की जल-संरचना को गहराई से प्रभावित किया है।
समय की पुकार है कि हिमाचल अपनी “जल संस्कृति” को पुनर्जीवित करे। अब यह केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं रहा; यह हर नागरिक की जिम्मेदारी बन चुकी है। यदि आज हमने जल के प्रति सजगता नहीं दिखाई, तो आने वाले वर्षों में हिमाचल की नदियाँ मात्र इतिहास के अध्याय बनकर रह जाएँगी। इसीलिए “अपना जल—अपनी जिम्मेदारी” का भाव हर घर तक पहुँचना चाहिए।
प्रकृति की चेतावनी: सूखते झरने, घटते जलस्तर:हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक बनावट सदैव जल-स्रोतों के लिए आदर्श रही है। यहाँ की नदियाँ — व्यास, सतलुज, यमुना, चिनाब और रावी — केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि जीवन की धमनियाँ हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन नदियों का जलस्तर घटा है। छोटे-छोटे झरने, जो कभी पूरे गाँव की प्यास बुझाते थे, अब गर्मियों में सूखने लगे हैं।
इस स्थिति के पीछे मुख्य कारण हैं -वनों की अंधाधुंध कटाई, पहाड़ी ढलानों पर कंक्रीट निर्माण, और वर्षा जल का सही संचयन न होना। हिमाचल में वर्षा तो होती है, पर उसका अधिकांश भाग बहकर नीचे चला जाता है। जल संरक्षण की परंपरागत प्रणालियाँ, जैसे “खाल”, “चहड़” और “कुह्लें”, अब लगभग विलुप्त हो चुकी हैं।प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है यदि हमने जल प्रबंधन को अनदेखा किया, तो नदियों की जीवन-रेखा टूट जाएगी। अब वक्त आ गया है कि जल संरक्षण को केवल चर्चा नहीं, बल्कि जन-आंदोलन बनाया जाए।
पारंपरिक जल-संरचना की वापसी की जरूरत:हिमाचल की लोक संस्कृति में जल का विशेष स्थान रहा है। पुराने समय में गाँव के लोग मिलकर “खालों” और “कुह्लों” की मरम्मत करते थे। यह केवल जल प्रबंधन नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता का प्रतीक था। हर गाँव में तालाब, बावड़ी या सोखता खड्ड मौजूद रहती थी, जो वर्षा जल को सहेजती थी।परंतु आधुनिकता की दौड़ में यह परंपरा पीछे छूट गई। पाइपों और टैंकों ने इन पारंपरिक प्रणालियों की जगह ले ली, परंतु जल का स्रोत अब भी वही है । हम प्राकृतिक तरीके से जल-संग्रहण नहीं करेंगे, तब तक टैंकर और पंप अस्थायी समाधान ही रहेंगे।जरूरत है कि हिमाचल अपने “जल-ग्राम मॉडल” को फिर से जीवित करे। हर पंचायत में वर्षा जल-संग्रहण प्रणाली लागू की जाए, घर-घर सोखता गड्ढे बनाए जाएँ, और बच्चों को विद्यालयों में जल-संरक्षण की शिक्षा दी जाए। यही हिमाचल की पारंपरिक पहचान को आधुनिक संदर्भ में जीवित रखेगा।
‘जल जीवन मिशन’ — योजना नहीं, सामाजिक आंदोलन बने:केंद्र सरकार का “जल जीवन मिशन” हिमाचल जैसे पर्वतीय प्रदेश के लिए वरदान साबित हो सकता है, बशर्ते इसे जनभागीदारी का रूप दिया जाए। यह मिशन हर घर तक नल से स्वच्छ जल पहुँचाने का लक्ष्य रखता है, लेकिन वास्तविक सफलता तभी संभव है जब जनता इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाए।आज कई पंचायतों में यह मिशन केवल निर्माण कार्यों तक सीमित है, जबकि इसका मूल उद्देश्य लोगों में जल के प्रति जिम्मेदारी की भावना पैदा करना था। यदि हर ग्राम पंचायत “वर्षा जल संग्रहण”, “पुनर्भरण कुएँ” और “गांव तालाब पुनर्जीवन” जैसी योजनाओं को स्थानीय स्तर पर अपनाए, तो हिमाचल फिर से जल-समृद्ध प्रदेश बन सकता है।जल जीवन मिशन को “सरकारी स्कीम” नहीं, “सामाजिक संकल्प” के रूप में देखा जाना चाहिए। जब गांव की महिलाएं, युवा और बच्चे मिलकर पानी के हर बूंद की रक्षा करेंगे, तभी यह मिशन वास्तव में सफल होगा।
हर घर बने ‘जल प्रहरी’:हिमाचल के हर नागरिक को यह समझना होगा कि जल की सुरक्षा केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर परिवार की जिम्मेदारी है। यदि हर घर अपने छत के पानी को संग्रहित करे, तो जल संकट का बड़ा हिस्सा दूर हो सकता है।“रूफ वॉटर हार्वेस्टिंग” जैसे सरल उपाय न केवल पर्यावरण हितैषी हैं, बल्कि घरों के खर्च में भी बचत करते हैं। विद्यालयों, मंदिरों और पंचायत भवनों को उदाहरण बनाकर गांवों में प्रेरणा केंद्र बनाया जा सकता है।इसके अलावा, जन-जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को सिखाया जा सकता है कि पानी की हर बूंद कीमती है। बच्चों में बचपन से यह संस्कार डालना कि “नल खुला छोड़ना अपराध है”, समाज के व्यवहार को स्थायी रूप से बदल सकता है।यदि हर घर जल प्रहरी बने, तो हिमाचल जल के लिए कभी प्यासा नहीं रहेगा।
वन संरक्षण और जल संरक्षण का अटूट रिश्ता:हिमाचल की जल समृद्धि का मूल कारण उसके घने वन रहे हैं। पेड़ वर्षा को आकर्षित करते हैं, मिट्टी को पकड़कर रखते हैं, और भूजल स्तर को बनाए रखते हैं। जब जंगल घटते हैं, तो नदियों का प्रवाह भी घटता है।पिछले कुछ वर्षों में शहरीकरण और सड़क निर्माण के कारण हजारों पेड़ काटे गए हैं। इससे न केवल भूस्खलन बढ़ा है, बल्कि पानी के प्राकृतिक स्रोत भी खत्म हो रहे हैं।अब वक्त आ गया है कि “एक पेड़, एक जल स्रोत” की नीति अपनाई जाए। जहां पेड़ लगें, वहाँ जल की सुरक्षा स्वाभाविक रूप से होगी। विद्यालयों और पंचायतों को ‘जल-वन मित्र’ योजना के तहत जोड़ा जाए, ताकि हर नया पौधा एक नए जलस्रोत की गारंटी बने।पेड़ और पानी का रिश्ता अटूट है। एक खत्म हुआ, तो दूसरा भी टिक नहीं पाएगा।
भविष्य की राह -नीति से नीयत तक:हिमाचल में जल संरक्षण के लिए नीति स्तर पर कई योजनाएं बन चुकी हैं, परंतु वास्तविक सफलता नीयत और सहभागिता से ही मिलेगी। सरकार को चाहिए कि वह प्रत्येक पंचायत में जल संरक्षण को “विकास का पहला मानक” बनाए। जो पंचायत जल-संग्रहण में आगे बढ़े, उसे विशेष प्रोत्साहन दिया जाए।साथ ही, पर्यावरण शिक्षा को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल कर अगली पीढ़ी को इस विषय से जोड़ा जाए। विश्वविद्यालयों में “वॉटर मैनेजमेंट स्टडी सेंटर” की स्थापना की जाए ताकि स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक समाधान तैयार किए जा सकें।सबसे महत्वपूर्ण जनसहभागिता। जब समाज खुद अपने जल की जिम्मेदारी उठाएगा, तभी विकास स्थायी होगा। हिमाचल के हर नागरिक को यह संकल्प लेना होगा कि वह जल का उपभोक्ता नहीं, संरक्षक बनेगा। यही संकल्प आने वाले कल की जीवनरेखा बनेगा।
“अपना जल, अपनी जिम्मेदारी”हिमाचल प्रदेश की आत्मा उसकी नदियों, झरनों और झीलों में बसती है। यदि ये सूख जाएँ, तो हिमाचल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। यह समय आत्ममंथन का है — क्या हमने अपने जल को वह सम्मान दिया जिसकी वह हकदार है?अब वक्त है कि हम सब मिलकर इस जल-जागरूकता को जनांदोलन बनाएं। प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक विद्यालय, प्रत्येक पंचायत इस दिशा में एक कदम बढ़ाए।“अपना जल, अपनी जिम्मेदारी” ( यह नारा नहीं, हिमाचल की नई जीवन-रेखा है) जब हम जल की रक्षा करेंगे, तभी प्रकृति हमारी रक्षा करेगी। यही हिमाचल की स्थायी समृद्धि का मार्ग है — हर बूंद में जीवन, हर प्रयास में संरक्षण।हिमाचल को “जल संरक्षण राज्य” के रूप में विकसित करने के लिए सरकार, समाज और नागरिक — तीनों को एक साथ कदम बढ़ाने होंगे। तभी हिमालय की गोद में फिर से गूंजेगा —
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