हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने हाल ही में प्रशासनिक अनुशासन को लेकर जो सख्त निर्देश जारी किए हैं, वे केवल एक आदेश नहीं बल्कि राज्य प्रशासन में सुधार का घोषणापत्र हैं। उन्होंने साफ कहा है कि अब अधिकारी और कर्मचारी समय पर कार्यालय पहुंचे, और कोई भी फाइल दो दिन से अधिक किसी टेबल पर नहीं रुकनी चाहिए।
हर 15 दिन में कामकाज की समीक्षा होगी, और जो अधिकारी काम नहीं करेंगे, उनके नाम सीधे मुख्यमंत्री तक भेजे जाएंगे।यह आदेश अपने आप में प्रशासनिक संस्कृति बदलने की शुरुआत हो सकता है — बशर्ते इसे कागजों में नहीं, अमल में उतारा जाए।

फाइलों की धूल में दबा विकास
यह किसी से छिपा नहीं कि प्रदेश के अधिकांश कार्यालयों में फाइलें महीनों नहीं, सालों तक धूल खाती रहती हैं।एक फाइल के पास होने में जितनी औपचारिकता और देरी होती है, वह किसी भी निवेशक, आम नागरिक या कर्मचारी के धैर्य की परीक्षा बन जाती है।यह देरी केवल काम की नहीं, व्यवस्था की मानसिकता की देरी है — जिसमें जवाबदेही से अधिक सुविधा को प्राथमिकता मिलती रही है।
मुख्य सचिव का यह निर्णय इस “ढुलमुल रवैये” पर सीधा प्रहार है।
अगर यह प्रणाली सिर्फ सचिवालय तक सीमित न रहकर जिला, उपमंडल और पंचायत स्तर तक लागू की जाए, तो हिमाचल प्रशासनिक सुधार की दिशा में उदाहरण बन सकता है।मुख्य सचिव संजय गुप्ता का यह निर्णय वास्तव में प्रदेश प्रशासन में वर्षों से जमी ढुलमुल कार्यप्रणाली और लापरवाही की मानसिकता पर सीधा प्रहार है। लंबे समय से सरकारी कार्यालयों में कार्य संस्कृति ऐसी बन गई थी कि फाइलें हफ्तों और महीनों तक अधिकारियों की मेज़ों पर पड़ी रहती थीं, निर्णय लेने में अनावश्यक देरी होती थी और जवाबदेही का कोई ठोस तंत्र नहीं था। इससे न केवल शासन व्यवस्था की गति धीमी हुई, बल्कि जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ा। गुप्ता का यह सख्त रुख इस जड़ता को तोड़ने का प्रयास है—जहां अधिकारी यह समझें कि विलंब अब विकल्प नहीं, बल्कि दंडनीय लापरवाही मानी जाएगी। इस निर्णय का उद्देश्य सिर्फ अनुशासन लागू करना नहीं, बल्कि एक ऐसी कार्य संस्कृति का निर्माण करना है जिसमें समयबद्धता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व प्रशासन के मूल मूल्य बन जाएँ।
अनुशासन और उत्तरदायित्व की संस्कृति
संजय गुप्ता का यह कहना कि “कामकाज में ढुलमुल रवैया अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा” — दरअसल हिमाचल के नौकरशाही ढांचे के लिए एक चेतावनी है।प्रशासनिक मशीनरी तभी प्रभावी होती है जब अधिकारी समय और संसाधन दोनों का सम्मान करें।सुबह 10 बजे तक कार्यालय में उपस्थित रहना, और बाहर जाने पर उच्च अधिकारियों को सूचित करना — यह सामान्य नियम हैं, पर वर्षों से सामान्य बातों का पालन असामान्य रूप से ढीला रहा है।
अगर हर विभाग में लागू हुआ तो तस्वीर बदलेगी
अगर सचिवालय का यह अनुशासनात्मक ढांचा हर विभाग, हर ज़िले, हर ब्लॉक कार्यालय में लागू किया जाए, तो हिमाचल प्रदेश की प्रशासनिक तस्वीर वाकई बदल सकती है।फाइलों की गति बढ़ेगी, निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी होगी, और जनता को राहत मिलेगी।प्रदेश के छोटे से छोटे विकास कार्यों में भी समयबद्धता आएगी।यह केवल नियम लागू करने की बात नहीं, बल्कि काम के प्रति दृष्टिकोण बदलने की बात है।जवाबदेही तय हो, तो वही सिस्टम मजबूत बनता है — अन्यथा योजनाएं और बजट केवल कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं।
वित्तीय अनुशासन की मिसाल
गुप्ता ने जब बिजली बोर्ड में रहते हुए 500 करोड़ का लाभ कमाया, तो यह साबित किया कि सही निगरानी और पारदर्शिता से घाटे को मुनाफे में बदला जा सकता है।आज जब राज्य की आर्थिक स्थिति कमजोर है, ऐसे में “बर्बादी रोककर घाटा कम करना” सिर्फ एक कथन नहीं बल्कि एक कार्यनीति है।यदि यही मानसिकता हर विभाग में अपनाई जाए — तो आने वाले दो साल में प्रदेश आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
मेरे संपादकीय दृष्टिकोण संजय गुप्ता का यह अभियान केवल समय पर आने-जाने का नहीं, बल्कि प्रशासनिक आत्म-सुधार का प्रतीक है।अगर मुख्यमंत्री के स्तर से लेकर ब्लॉक स्तर तक हर अधिकारी इस नियम का पालन करे, तो फाइलों पर जमी धूल हटेगी और जनता का विश्वास लौटेगा।आज हिमाचल को सिर्फ योजनाओं की नहीं, बल्कि संवेदनशील और सक्रिय शासन की जरूरत है और यदि यह नियम सख्ती से पूरे प्रदेश में लागू हो गया — तो निश्चय ही, हिमाचल की दिशा और दशा दोनों बदल जाएंगी।

