हेडलाइन्स
👉स्कूल कॉम्प्लेक्स सिस्टम का विरोध तेज, शिक्षक संघ जवाली इकाई 5 अक्तूबर को उतरेगी सड़कों पर
👉शिक्षक संघ का ऐलान: 5 अक्तूबर को जवाली से नगरोटा सूरियां तक विरोध प्रदर्शन
👉कॉम्प्लेक्स प्रणाली के खिलाफ शिक्षक संघ की रैली, मुख्यमंत्री को सौंपेंगे ज्ञापन
👉हिमाचल में नई स्कूल कॉम्प्लेक्स प्रणाली के विरोध की रणनीति, जवाली इकाई ने बनाई कार्ययोजना
Jawali /03 oct 2025/ Edtior Ram Parkash Vats
(जवाली इकाई – राजकीय शिक्षक संघ)स्थान: विश्रामगृह जवाली में अध्यक्ष राजेश कुमार अध्यक्षता में हुई इकाई जिसमें निर्णय:लिए गए की 5 अक्तूबर को जवाली और नगरोटा सूरियां शिक्षा खंडों के प्राथमिक शिक्षक सुबह 11 बजे विश्रामगृह जवाली में एकत्र होंगे।वहां से रोष रैली एसडीएम कार्यालय जवाली तक निकाली जाएगी।मिनी सचिवालय जवाली के बाहर दोपहर 2 बजे तक धरना-प्रदर्शन होगा।इसके बाद मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू के नाम ज्ञापन एसडीएम को सौंपा जाएगा।
संगठनात्मक नेतृत्व और उपस्थिति:-अध्यक्ष: राजेश कुमारमहासचिव: पवन शर्माकोषाध्यक्ष: मनजीत धीमानमुख्य संरक्षक: केवल सिंह -मुख्य सलाहकार: सुरेश कुमारी-वरिष्ठ उपप्रधान: अंजू शर्माउपप्रधान: राकेश परमारअन्य शिक्षक नेता: गुरविंदर पाल आदि
स्कूल कॉम्प्लेक्स सिस्टम: क्या है :-
सरकार के निर्देशों के अनुसार एक बड़े Senior Secondary स्कूल (GSSS) का प्रिंसिपल उस “कॉम्प्लेक्स” का नोडल अधिकारी बनेगा।उसके आसपास के सभी प्राथमिक, मध्य एवं उच्च विद्यालय उसी कॉम्प्लेक्स के अधीन प्रशासनिक नियंत्रण में होंगे।शिक्षकों को आवश्यकता अनुसार, कार्य आवंटन प्रिंसिपल करेगा; प्रिंसिपल को हर-दो महीने में प्रत्येक अधीनस्थ स्कूल का निरीक्षण करना होगा।
विरोध के मुख्य कारण
भावनात्मक / सामाजिक असर👉छोटे गांवों में स्कूल सिर्फ शिक्षा का स्थान नहीं रहते, सामाजिक गतिविधियों, स्थानीय पहचान और सामाजिक संपर्क का केंद्र होते हैं। जब इन्हें बंद किया जाए या उन्हें बड़े प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन किया जाए, तो ये सामाजिक पहलू प्रभावित हो सकते हैं।गांव-देहात के स्कूलों की दूरी और पहुंच👉छोटे स्कूलों का मुख्य उद्देश्य होता है कि बच्चों को उनके गांव के करीब शिक्षा मिले। यदि स्कूलों को एक बड़े कॉम्प्लेक्स के अधीन कर दिया जाए, तो उनके स्कूलों को बंद कर, छात्रों को दूर स्कूलों में आना-जाना होगा, जो मुश्किल हो सकता है — विशेषकर पहाड़ी इलाकों में जहाँ रास्ते खराब हैं, मौसम की समस्या है।छात्रों व अध्यापकों का अतिरिक्त बोझ👉प्रिंसिपल या अन्य अधिकारी को कई स्कूलों का प्रबंधन करना होगा, यात्रा करनी पड़ेगी, समय अधिक लगेगा। अध्यापकों की पोस्टिंग या कार्य विभाजन में बदलाव हो सकते हैं जिससे उनको असंतोष हो सकता है।👉स्थानीय नियंत्रण की कमी प्रत्येक स्कूल का स्थानीय प्रबंधन और स्थानीय जरूरतों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। शिक्षा से जुड़े स्थानीय विविधताएँ (भाषा, संस्कृति, संसाधन आदि) प्रभावित हो सकती हैं।इन्फ्रास्ट्रक्चर व संसाधन की चुनौतियाँ👉इस व्यवस्था को सफल बनाने के लिए पर्याप्त संसाधन, भौतिक और मानव, चाहिए: परिवहन सुविधाएँ, स्कूलों के बीच पहुँच, अध्यापकों की संख्या, सुसज्जित स्कूल भवन, आदि। इन माध्यमों की कमी होने पर व्यवस्था अधर में रह सकती है।भविष्य में नौकरियों / पदोन्नति पर असर👉पदाधिकारी और अध्यापक यह सोचते हैं कि इससे पदों, अधिकारों, पदोन्नति के अवसरों में बदलाव होगा—कुछ पद स्थायी नहीं रहेंगे, कार्य वितरण बदल जाएगा।कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का अस्तित्व खतरे में👉हिमाचल में बहुत से प्राथमिक स्कूलों में छात्रों की संख्या बहुत कम है। सरकार ने ऐसे स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।इससे ग्रामीण इलाकों में शिक्षा का विकल्प कम होगा।परिवहन और समय की समस्याएँ👉दूर-दराज के छात्रों के लिए स्कूल जाने-आने में समय व खर्च बढ़ेगा, विशेषकर पहाड़ों में। इससे परिवारों पर बोझ बढ़ सकता है।
सरकार के तर्क / मजबूर पक्ष
छोटी-छोटी स्कूलों में छात्रों की संख्या कम होना👉हिमाचल में बहुत से प्राथमिक स्कूल हैं जिनमें 40 से कम विद्यार्थी हैं। स्थिति यह है कि अकेले प्राथमिक स्तर पर लगभग 87% स्कूलों में 40 से कम छात्र हैं। ऐसे स्कूलों में संसाधन (शिक्षक, पुस्तकें, इंगित छात्र-साधन) अछे से नहीं लग पाते।शिक्षकों की कमी एवं संसाधनों का बेहतर उपयोग👉सरकार ने कहा है कि कई स्कूलों में शिक्षक-विभाजन में समस्या है, कुछ स्कूलें खाली-खाली चलती हैं; ऐसी स्थिति में शिक्षकों को बैतर विभाजित करना, उनका काम बांटना, एवं उन्हें ज़रूरत के अनुसार विभिन्न स्कूलों में भेजना संभव नहीं हो पा रहा है। कॉम्प्लेक्स सिस्टम के माध्यम से शिक्षक संसाधन का “राशनलीज़ेशन” (rationalisation) किया जा सकेगा।
शिक्षण गुणवत्ता में सुधार की कोशिश👉सरकार के अनुसार, स्कूलों के अलग-अलग, छोटे-छोटे संचालन की वजह से निगरानी, मानक कायम रखना और छात्र-शिक्षण की गुणवत्ता सुनिश्चित करना कठिन है। विद्यालयों को क्लस्टर या कॉम्प्लेक्स में जोड़कर, प्रमुख प्रिंसिपल या वरिष्ठ विद्यालयों द्वारा निरीक्षण और मार्गदर्शन सुनिश्चित किया जाएगा।नीचे जाकर प्रशासन आसान बनाना / प्रबंधन खर्च कम करना👉
छोटे-छोटे स्कूलों पर अलग-अलग प्रशासन चलने से व्यय बढ़ता है तथा प्रबंधन जटिल होता है। कॉम्प्लेक्स व्यवस्था से यह संभव होगा कि एक वरिष्ठ विद्यालय (Senior Secondary School) के प्रिंसिपल कुछ प्रशासनिक कर्तव्यों को देख लें, विभागीय नियंत्रण केंद्रित हो, अनावश्यक duplications कम हों।शिक्षा सम्बन्धी संसाधनों और गतिविधियों का साझा उपयोग (resource sharing)👉क्लस्टर / कॉम्प्लेक्स स्कूलों में संसाधन साझा होंगे — जैसे पुस्तकें, प्रयोगशालाएँ, खेल के सामान, सहायक शैक्षिक सामग्री, मध्य-भोजन आदि। इससे खर्चों में बचत होगी और संसाधनों का उपयोग अधिक संतुलित होगा।👉सरकारी स्कूलों में नामांकन (enrolment) में लगातार कमी आ रही है। बहुत से स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम होने के कारण सरकारी खर्च की प्रभावशीलता कम हो रही है। नामांकन की गिरावट, जनसंख्या वृद्धि दर में कमी, निजी स्कूलों की बढ़ती स्वीकार्यता आदि को सरकार जोड़ रही है। नीति- और रिपोर्ट-आधारित निर्णय👉सरकार ने कई रिपोर्टों और निर्देशों (जैसे UDISE+, शिक्षा विभाग की गाइडलाइन्स, स्कूल-क्लस्टर निर्देश) को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया है। यह राष्ट्र शिक्षा नीति (National Education Policy) आदि से प्रेरित है, जहां स्कूल क्लस्टर/कॉम्प्लेक्स मॉडल को प्रोत्साहन दिया गया है ताकि शिक्षा में कुशल प्रशासन व संसाधन साझा किया जाए।

