सारगर्भित है कि धर्म के स्तर पर जाति-पांति का कोई औचित्य नहीं ।
सनातन धर्म की आत्मा सदैव मानवता, समभाव और आत्मा की एकता पर आधारित रही है, परंतु जाति-पांति का भेदभाव इसकी सबसे बड़ी प्रलयंकारी चोट साबित हुआ। इसने समाज को टुकड़ों में बाँटकर एकता और सामूहिक शक्ति को कमजोर किया। धर्म जहाँ समरसता और करुणा का संदेश देता है, वहीं जातिगत ऊँच-नीच ने इंसान को इंसान से दूर कर दिया। यही कारण है कि सनातन की सार्वभौमिकता और विश्वकल्याण की भावना आहत हुई। आज भी यह अभिशाप पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और समय-समय पर सामाजिक सौहार्द और धर्म की छवि को धूमिल करता है, जो अत्यंत पीड़ादायक है।सामाजिक सामंजस्य और मानवता पर इस तरह की घटनाएँ गहरी चोट करती हैं।हिमाचल की पहचान और छवि पर नकारात्मक असर पड़ता है।और सबसे अहम है सामुदायिक जागरूकता, शिक्षा और व्यवहारिक सुधार।
धार्मिक आधार पर जाति-पांति का निषेध और मानवता का आदर्श:हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, सिख परंपरा और यहां तक कि ईसाई शिक्षाओं तक – सभी धर्मों का मूल आधार मानव समानता और करुणा है। वेदों और उपनिषदों में ‘अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्’ का संदेश स्पष्ट है कि संपूर्ण सृष्टि एक ही परमात्मा की संतान है। गीता में श्रीकृष्ण ने कर्म को ही सर्वोपरि बताया है, जाति या जन्म को नहीं। बुद्ध ने करुणा और अहिंसा का संदेश देकर जातिगत श्रेष्ठता का निषेध किया। गुरु नानक देव ने तो ‘एक ओंकार’ कहकर हर व्यक्ति को समान बताया और लंगर परंपरा में ऊँच-नीच का भेद मिटा दिया। ऐसे में धार्मिक स्तर पर जाति-पांति की दीवारें टिकती ही नहीं। फिर भी, विडंबना यह है कि समाज के कई हिस्सों में आज भी यह भेदभाव जड़ जमाए बैठा है। यह उस आध्यात्मिक और मानवीय आदर्श के विरुद्ध है जिस पर हिमाचल जैसे राज्य की पहचान “देवभूमि” के रूप में बनी है।
सामाजिक सामंजस्य और मानवता पर प्रश्नचिह्न:सामाजिक सामंजस्य केवल किताबों और मंदिरों के उपदेशों से कायम नहीं होता, यह व्यवहार में उतरना चाहिए। हाल ही में रोहड़ू में हुई घटना ने पूरे हिमाचल को झकझोर कर रख दिया। एक मासूम बच्चा केवल इसलिए समय पर इलाज नहीं पा सका क्योंकि कुछ लोग छुआछूत और जातिगत पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए शर्म और आत्मग्लानि का विषय है। देवभूमि कहलाने वाला प्रदेश यदि ऐसी संकीर्णताओं से मुक्त नहीं हो सका तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हमारी आस्था और आध्यात्मिकता का मूल्य क्या है? सामाजिक सामंजस्य टूटने का अर्थ है आपसी विश्वास का ह्रास, और यही किसी भी सभ्य समाज के लिए सबसे बड़ा संकट है।
जातिगत भेदभाव का हिमाचल की छवि पर असर:हिमाचल प्रदेश देश और दुनिया में अपनी संस्कृति, लोक परंपराओं और सरलता के लिए पहचाना जाता है। पर्यटन से लेकर शिक्षा और साहित्य तक—यह प्रदेश हमेशा “शांति और सौहार्द” का प्रतीक बताया गया है। किंतु जब जातिगत भेदभाव और छुआछूत की खबरें बाहर जाती हैं तो यह पूरी छवि धूमिल कर देती हैं। एक तरफ सरकार “समान अवसर”, “समावेशी विकास” और “सामाजिक न्याय” की बातें करती है, दूसरी ओर जमीनी हकीकत में ऐसे अमानवीय कृत्य समाज की परिपक्वता पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। यह केवल हिमाचल का मुद्दा नहीं, बल्कि समूचे देश की छवि पर भी असर डालता है। विशेषकर युवा पीढ़ी और बाहरी दुनिया के सामने यह संदेश जाता है कि देवभूमि अभी तक अंधविश्वास और जातीय संकीर्णता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी। अगर यह स्थिति नहीं बदली तो न केवल सामाजिक प्रगति बाधित होगी, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक विकास पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
सामुदायिक जागरूकता और भविष्य की राह:अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इससे निकलने की राह क्या है? केवल सरकार के कानून या प्रशासनिक आदेश पर्याप्त नहीं हैं। जरूरत है सामाजिक स्तर पर एक बड़े जागरण आंदोलन की। विद्यालयों में बच्चों को जाति और भेदभाव से परे समानता का पाठ पढ़ाना होगा। पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान चलाकर यह समझाना होगा कि जाति नहीं, बल्कि शिक्षा, चरित्र और कर्म ही व्यक्ति का मूल्य तय करते हैं। धार्मिक संस्थानों, मंदिरों और आश्रमों को भी इसमें अग्रणी भूमिका निभानी होगी, क्योंकि लोग वहां से प्रेरणा लेते हैं। मीडिया और साहित्य को भी इस विमर्श को जन-जन तक पहुँचाना होगा। सामुदायिक चेतना का यह संकल्प तभी सफल होगा जब हर व्यक्ति अपने भीतर झाँककर यह तय करे कि वह इंसानियत को पहले रखेगा, जाति को बाद में। रोहड़ू की घटना जैसे हादसे हमें केवल दुखी ही न करें, बल्कि बदलाव के लिए मजबूर करें। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी उस मासूम आत्मा को और यही रास्ता है हिमाचल को वास्तविक “देवभूमि” बनाए रखने का।

