‘किताबें’ खुद नहीं कुछ बोलती
दूसरों के मुख से बुलवा देती हैं l
किताबें रोज रोने वालों को भी
सज्जनों! पल मेँ हंसा देती हैं l
कभी खूब हंसने वालों को भी
सबके सामने ही रुला देती हैं l
मैंने सुना है बड़ों के मुख से भी
यह रस्सी का सांप बना देती हैं l
यदि दिल लगाकर पढ़ो इनको
तो दुनिया का गम भुला देती हैं l
याद आए पढ़ते वक्त किसी की
तो दिल में दर्द भी जगा देती हैं l
पढ़ा करो जरूर इन किताबों को
यह मन का भरम मिटा देती हैं l
पूछो उनको जो लिखते किताबें
उनका पूरा जीवन खपा देती हैं l
अच्छी किताबें जीवन का दर्पण
हमें असली चेहरा दिखा देती हैं l
छुपाकर रखे मन के भावों को
सज्जनों!अक्षर बन लिखा देती हैं l
पड़ी-पड़ी कुड़ों के ढेर पर भी
ये अपनी हैसियत दिखा देती हैं l
यदि कोई भी इनको ना पढ़े तो
अपने को चूहों से कटवा देती हैं l
भूलों नहीं इनको जलाने वालों
ये समाज में आग लगा देती हैं l
क्या भरा है ‘आदेश’ के दिल मेँ
सज्जनों सबको राज बता देती हैं

द्वारा :-स्वामी आदेश पुरी

