लगता मलाह समझ गया
तूफान के हर इशारे को l
इसलिए कश्ती आने लगी
धीरे से चल के किनारे को l
मझधार में ढूंढती थी कश्ती
किसी तिनके के सहारे को l
सूखी नदी भी डुबो देती है
कभी किस्मत के मारे को l
सब कुछ लुटा देने वाले भी
तरसते हैं अपने गुजारे को l
बैठकर कश्ती में कई लोग
देखते कुदरत के नजारे को l
उसी कश्ती में एक मासूम भी
ढूंढ रहा है अपने प्यारे को l
सुननी पड़ती हैं सभी की बातें
कभी हमें तो कभी तुम्हारे को l
पूछ लिया करो दिल की बात
पनियाले में “आदेश” विचारे को l
श्रीमद्भागवत वाचक श्री 108 स्वामी आदेश पुरी जी

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