शिमला/ 28 सितम्बर 2025/ राज्य चीफ़ ब्यूरो विजय समयाल
हिमाचल प्रदेश में सहकारिता आन्दोलन की नींव सहभागिता और साझेदारी की मूल भावना पर रखी गई थी। प्रारम्भ में सहकारी समितियां केवल कृषि, ऋण और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति तक ही सीमित थीं। लेकिन समय के साथ यह आन्दोलन इतना व्यापक हुआ कि आज यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गया है। प्रदेश सरकार के प्रयासों से सहकारिता का दायरा कृषि के अतिरिक्त डेयरी, बागवानी, विपणन, हस्तशिल्प, मत्स्य पालन और महिला स्वावलम्बन तक फैल चुका है।प्रदेश की सहकारी समितियां आज देश के समक्ष एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि हिमाचल में लगभग 20 लाख लोग सहकारिता से जुड़े हुए हैं।
प्रदेश में पंजीकृत पाँच हजार से अधिक समितियां:वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में 5,000 से अधिक सहकारी समितियां पंजीकृत हैं। इनमें से2,287 प्राथमिक कृषि ऋण समितियां ग्रामीण वित्तीय समावेशन को सुनिश्चित कर रही हैं।971 डेयरी समितियां दूध उत्पादन और वितरण का कार्य कर रही हैं।441 समितियां बचत एवं ऋण की सुविधा प्रदान कर रही हैं।386 प्राथमिक विपणन सहकारी समितियां किसानों को उनकी उपज बेचने में मदद करती हैं।76 समितियां मत्स्य पालन समुदाय के उत्थान में सक्रिय हैं।हाल ही में 6 नई बहुउद्देशीय समितियां भी गठित की गई हैं, जिनका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में विविध सेवाएं उपलब्ध कराना है।
मुख्यमंत्री सुक्खू की दूरदर्शी पहल:मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में सहकारी समितियों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा रही है। सरकार की प्राथमिकता एक सतत सहकारी विकास मॉडल अपनाने की है। इसके अंतर्गत संस्थागत सुधार, नवाचार, समावेशन और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। सहकारी नीति का लक्ष्य हिमाचल को आत्मनिर्भर राज्य के रूप में स्थापित करना है।—डेयरी सहकारिता ने लिखी नई इबारतहिमाचल प्रदेश में डेयरी क्षेत्र सहकारिता की सबसे बड़ी सफलता के रूप में उभरकर सामने आया है।प्रदेश की 971 दुग्ध सहकारी समितियों में 35,720 महिलाएं सक्रिय हैं।हाल ही में 561 नई समितियों का गठन हुआ है।हिमाचल देश का पहला राज्य है जिसने किसानों को दूध पर न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रदान किया है।प्रदेश में प्रतिदिन औसतन 2.33 लाख लीटर गाय का दूध और भैंस का दूध 61 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीदा जा रहा है। इससे सीधे-सीधे हजारों किसानों और पशुपालकों को आर्थिक सुरक्षा मिली है।
हिम गंगा योजना : डेयरी का भविष्यप्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी हिम गंगा योजना का पहला चरण हमीरपुर और कांगड़ा ज़िले में लागू किया गया है। इसके तहत :दूध खरीद, प्रसंस्करण और विपणन प्रणाली को आधुनिक बनाया जा रहा है।नई दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों का गठन किया जा रहा है।नए प्रसंस्करण संयंत्रों की स्थापना और पुराने संयंत्रों का उन्नयन किया जा रहा है।वर्तमान में मिल्कफेड को पाँच इकाइयों — कांगड़ा, मंडी, नाहन, शिमला और नालागढ़ — के माध्यम से संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य पूरे प्रदेश में दूध आपूर्ति, पैकेजिंग और विपणन को बेहतर बनाना है।
महिलाओं की बढ़ी भागीदारी:हिमाचल की महिलाएं सहकारिता आन्दोलन की सबसे मजबूत कड़ी बनकर सामने आई हैं।ऊना ज़िले में 5,000 महिलाओं ने मिलकर स्वयं वूमेन फेडरेशन का गठन किया है।महिला स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने में हिम ईरा ब्रांड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए फूड वैन उपलब्ध करवाई गई हैं, जिनका संचालन भी महिलाएं कर रही हैं।इन पहलों ने महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त किया है, बल्कि सामाजिक पहचान और आत्मविश्वास भी प्रदान किया है।
ई-कॉमर्स से कारीगरों को नया बाजार:हिमाचल की संस्कृति और परंपरा को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच तक पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने himira.co.in ई-कॉमर्स वेबसाइट शुरू की है। इसके माध्यम से :बुनकरों, कारीगरों और स्थानीय उद्यमियों के उत्पाद ऑनलाइन बेचे जा रहे हैं।प्रदेश के हस्तशिल्प, हथकरघा और जैविक उत्पादों को बड़ा बाजार उपलब्ध हुआ है।ग्रामीण कारीगरों की आर्थिकी मजबूत हुई है और उन्हें सीधे ग्राहकों तक पहुँचने का अवसर मिला है।—युवाओं को स्वरोजगार की राहसहकारी समितियों ने युवाओं को स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार और नवाचार के अवसर प्रदान किए हैं। कृषि, डेयरी, हस्तशिल्प और विपणन के क्षेत्र में सहकारिता ने न केवल रोजगार उपलब्ध करवाए हैं बल्कि पलायन की समस्या को भी कम किया है।
सहकारिता : सामाजिक समरसता का प्रतीक:हिमाचल प्रदेश में सहकारिता आन्दोलन केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक समरसता और साझेदारी का प्रतीक भी बन गया है। सहकारी समितियों ने गांव-गांव में सहयोग, विश्वास और पारदर्शिता की संस्कृति को बढ़ावा दिया है। यही कारण है कि सहकारिता आज प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार बन चुकी है।
सारगर्भित है कि हिमाचल प्रदेश की सहकारी समितियां सरकार और जनता के साझा प्रयासों का उदाहरण हैं। यहां की सहकारिता ने न केवल किसानों, पशुपालकों और कारीगरों को सशक्त किया है, बल्कि महिलाओं और युवाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में प्रदेश सरकार सहकारी समितियों को नई दिशा दे रही है। इससे स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में सहकारिता न केवल हिमाचल को आत्मनिर्भर राज्य बनाने में अहम योगदान देगी, बल्कि यह पूरे देश के लिए भी एक सफल मॉडल साबित होगी।

