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हिमाचल की बेटियों का न्यायिक सेवा में उदय

RamParkash Vats
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सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। केवल मेहनत और सतत प्रयास से ही मंजिल पाई जा सकती है।”

संघर्ष से सफलता तक – सिमरन और सिमरनजीत की कहानी

शिमला/28 सितम्बर 2025/ चीफ ब्यूरो विजय समया

हिमाचल प्रदेश की धरती हमेशा से शिक्षा, संस्कृति और दृढ़ संकल्प की मिसाल रही है। यहाँ के छोटे-छोटे गांवों से निकले बच्चे अक्सर अपने परिश्रम और प्रतिबद्धता से ऐसे मुकाम हासिल करते हैं, जिनकी कल्पना भी कठिन लगती है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश न्यायिक सेवा परीक्षा के परिणामों ने इस तथ्य को और भी उजागर कर दिया है। इस बार घोषित नतीजों में 19 अभ्यर्थियों ने सफलता प्राप्त की, जिनमें 16 बेटियाँ हैं। यह आँकड़ा अपने आप में महिला सशक्तिकरण और शिक्षा के बढ़ते प्रभाव का जीवंत प्रमाण है। इन्हीं सफल बेटियों में दो नाम विशेष रूप से चर्चा में आए—

मंडी जिले की सिमरन और ऊना जिले की सिमरनजीत कौर।दोनों की पृष्ठभूमि भले अलग हो, लेकिन संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की डोर उन्हें जोड़ती है। एक तरफ मंडी की सिमरन ने पहले ही प्रयास में न्यायिक सेवा परीक्षा पास कर इतिहास रच दिया, वहीं ऊना की सिमरनजीत ने ट्रक चालक पिता के सपनों को अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और 18 घंटे की पढ़ाई के बल पर साकार किया। इन दोनों कहानियों ने हिमाचल को गौरवान्वित किया है और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हैं।

मंडी की सिमरन

सादगी से सफलता तक का सफरमंडी जिले के द्रंग क्षेत्र के पद्धर गांव की सिमरन ने यह सिद्ध कर दिया कि कठिन परिस्थितियाँ यदि आपके रास्ते में आएं भी, तो दृढ़ इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत से हर बाधा को पार किया जा सकता है।साधारण परिवार में जन्मी सिमरन के पिता रविकांत वर्तमान में जिला परिषद सदस्य हैं और माता धुमा देवी गृहिणी हैं। परिवार ने हमेशा शिक्षा को प्राथमिकता दी। प्रारंभिक पढ़ाई भारतीय मॉडल हाई स्कूल पद्धर से हुई, जबकि जमा दो की पढ़ाई नेताजी सुभाष चंद्र मेमोरियल राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला से पूरी की। इसके बाद उन्होंने 2017–2022 तक हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ, काला अंब (सिरमौर) से विधि की पढ़ाई की।स्नातक के बाद सिमरन ने खुद को पूरी तरह न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी में समर्पित कर दिया। जनवरी 2025 में आयोजित परीक्षा में उन्होंने पहले ही प्रयास में सफलता हासिल की। यह उपलब्धि केवल उनके लिए ही नहीं, बल्कि पूरे मंडी और द्रंग क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन गई। ग्रामीणों ने मिठाइयाँ बाँटकर और शुभकामनाएँ देकर अपनी खुशी जाहिर की।सिमरन मानती हैं कि उनकी सफलता का राज परिवार का सहयोग, शिक्षकों का मार्गदर्शन और उनकी अपनी सतत मेहनत है। उनका संकल्प है कि न्यायपालिका में ईमानदारी और निष्ठा के साथ समाज को न्याय दिलाएँगी।

ऊना की सिमरनजीत

सिमरनजीत कौर की कहानी यह साबित करती है कि सपनों की उड़ान किसी साधन या परिस्थिति की मोहताज नहीं होती। एक ट्रक चालक की बेटी होकर भी उन्होंने बचपन से ही पढ़ाई को अपना संकल्प बनाया और अथक परिश्रम से उसे पूरा किया। पिता की आंखों की नमी, बेटी की उपलब्धि पर गर्व का प्रतीक है। डीएवी स्कूल से शुरू हुई शिक्षा यात्रा, पंजाब विश्वविद्यालय तक पहुंची और फिर न्यायिक सेवा की कठिन राह पर उन्होंने दिन-रात मेहनत कर अपनी पहचान बनाई। तमाम संघर्षों और सीमाओं के बावजूद 15–18 घंटे पढ़ाई करने का उनका जज़्बा हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो जीवन में बड़ा मुकाम पाना चाहता है।

अंततः जनवरी 2025 में आई सफलता ने उनके पूरे परिवार के जीवन में उत्सव का माहौल ला दिया।सिमरनजीत कहती हैं कि न्यायिक सेवा में आने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता के चाचा तारा सिंह से मिली, जो स्वयं न्यायिक सेवाओं में रहे। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, दादा-दादी, ताया-तायी, भाई-बहनों और विशेष रूप से ताया के बेटे इकबाल सिंह और उनकी पत्नी हरप्रीत कौर को दिया, जिन्होंने हर कदम पर उनका साथ निभाया।उनका संदेश युवाओं के लिए स्पष्ट है।

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