भारत के स्वतंत्र सैनानी भारत माँ का शूरवीर र्निभिक मां भारती रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वाला करतार सिंह सराभा धारावाहिक (14) संपादक राम प्रकाश वत्स
मां भारती की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वाले इन सभी क्रांतिकारियों को हमारा कोटि कोटि नमन…

भारत की आज़ादी केवल राजनीतिक समझौतों, प्रस्तावों या सभाओं का परिणाम नहीं थी। यह स्वतंत्रता उन युवाओं के रक्त से सिंचित हुई, जिन्होंने हँसते-हँसते अपने जीवन का बलिदान दे दिया। वे युवा, जिनके सपनों में सुख नहीं बल्कि स्वाधीनता थी, जिनके लिए जीवन से अधिक मूल्यवान देश था। गदर आंदोलन और उसके अमर शहीद करतार सिंह सराभा ऐसे ही बेमिसाल बलिदान की अमर गाथा हैं।
अप्रैल 1919 में जलियांवाला बाग़ में ब्रिटिश जनरल डायर के आदेश पर बहाया गया निर्दोषों का खून भारत के आत्मसम्मान पर किया गया सबसे बड़ा प्रहार था। उस समय भगत सिंह मात्र बारह वर्ष के थे। किंतु उस बालक के हृदय में जो ज्वाला जली, उसने आगे चलकर पूरे साम्राज्य को हिला दिया। पजामा-कमीज़ पहने भगत सिंह जलियांवाला बाग पहुँचे, खून से सनी मिट्टी को बोतल में भरा और उसे जीवनभर अपने पास रखा। वह मिट्टी उनके लिए प्रतिशोध नहीं, बल्कि प्रतिज्ञा थी—देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की।

यही भावना उन्हें करतार सिंह सराभा तक ले गई। दिल्ली असेंबली बम कांड के बाद जब भगत सिंह गिरफ्तार हुए, उनकी जेब से जो तस्वीर मिली, वह करतार सिंह सराभा की थी। भगत सिंह गर्व से कहा करते थे—“यही मेरे गुरु हैं।” यह कथन बताता है कि सराभा केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के पथप्रदर्शक थे।
जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था, तब देश से हज़ारों मील दूर कनाडा और अमेरिका में बसे भारतीयों ने गदर पार्टी की स्थापना की। उनका उद्देश्य था—विदेश में रहकर भी मातृभूमि को आज़ाद कराना। गदर पार्टी ने ‘गदर’ नामक अख़बार निकाला, जिसमें क्रांति का उद्घोष था। पहले विश्व युद्ध के समय उन्होंने अवसर को पहचाना और 21 फरवरी 1915 को भारत की सैन्य छावनियों में विद्रोह की योजना बनाई। यह केवल एक साज़िश नहीं थी, यह स्वतंत्र भारत का सपना था।

दुर्भाग्यवश अंग्रेज़ों की कूटनीति ने इस योजना को विफल कर दिया। गद्दार कृपाल सिंह की मुखबिरी ने क्रांति की तारीख़ उजागर कर दी। फिर भी क्रांतिकारियों ने हार नहीं मानी। करतार सिंह सराभा 70-80 साथियों के साथ फिरोजपुर छावनी की ओर बढ़े, लेकिन विश्वासघात के कारण भारतीय सैनिकों को पहले ही निहत्था कर दिया गया था। क्रांति दबा दी गई, पर विचार जीवित रह गया।
28 मार्च 1915 को करतार सिंह सराभा गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें लाहौर की सेंट्रल जेल ले जाया गया और उन पर देशद्रोह का मुकदमा चला। अदालत में उन्होंने निर्भीक होकर स्वीकार किया कि उन्होंने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए यह सब किया। उन्होंने कहा—“मेरे लिए इस मुकदमे का कोई अर्थ नहीं। मातृभूमि के लिए बलिदान देना अपराध नहीं, गर्व है।” उनका यह बयान अंग्रेज़ न्याय व्यवस्था की नींव हिला देने वाला था।
फाँसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद भी उनके चेहरे पर भय नहीं था। आश्चर्य की बात यह थी कि इस अवधि में उनका वजन दस पौंड बढ़ गया—यह उस आत्मबल और निडरता का प्रमाण था, जो केवल सच्चे देशभक्त में हो सकती है। फाँसी से दो दिन पहले जब उनके दादा मिलने आए, तो सराभा ने उनसे पूछा—“बताइए, कौन-सी मौत बेहतर है—बीमारी से तड़प-तड़प कर मरना या देश के लिए हँसते-हँसते फाँसी चढ़ जाना?”

16 नवंबर 1915 को वह ऐतिहासिक क्षण आया, जब लाहौर जेल में सात क्रांतिकारियों को फाँसी दी गई। करतार सिंह सराभा फाँसी के तख्त पर पहुँचे, फंदे को चूमा और पूरे गर्व से “वंदे मातरम्” का नारा लगाया। मृत्यु उनके लिए अंत नहीं थी, बल्कि अमरता का द्वार थी।
करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले, जगत सिंह, हरनाम सिंह, सुरैन सिंह, बख्शीश सिंह और इशर सिंह—ये नाम केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज शब्द नहीं हैं, ये भारत की आत्मा के स्तंभ हैं। इनका बलिदान हमें सिखाता है कि स्वतंत्रता भीख में नहीं मिलती, उसे प्राणों से खरीदा जाता है।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस लेते हैं, तब यह हमारा नैतिक कर्तव्य है कि इन शहीदों के बलिदान को केवल स्मरण न करें, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारें। हँसते-हँसते देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले ये अमर शहीद सदैव हमें राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देते रहेंगे।

