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संपादकीय मंथन, विश्लेषण और चिंतन: हिमाचल का बढ़ता कर्ज: आर्थिक सतर्कता की आवश्यकता

RamParkash Vats
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बढ़ता ऋण और वित्तीय दबाव:-राज्य की कुल देनदारियाँ 2023-24 तक लगभग ₹95,000 करोड़ तक पहुँच गईं। देनदारियों का GSDP अनुपात 2019-20 के करीब 39% से बढ़कर 2023-24 में लगभग 44% पर आ गया। यह संकेत है कि आर्थिक क्षमता पर कर्ज़ का बोझ तेजी से चढ़ रहा है। केन्द्र से मिलने वाली अस्थायी सहायता पर निर्भर रहना लम्बी अवधि में टिकाऊ विकल्प नहीं है।

राजस्व की सीमाएँ और खर्च की मजबूरी:-समस्या की जड़ें दो हैं। पहली—राजस्व स्रोतों की कमी। राज्य की आय मुख्यतः पर्यटन, कृषि और सीमित औद्योगिक गतिविधियों पर आधारित है, जो अस्थिर हैं। दूसरी—व्यय की संरचना। वेतन, पेंशन, सब्सिडी और बिजली पर होने वाला खर्च इतना अधिक है कि उसमें कटौती करना लगभग असंभव है। इसके चलते विकास परियोजनाओं के लिए धन सीमित हो जाता है और कई योजनाएँ अधूरी रह जाती हैं।

कारण स्पष्ट हैं और दोहरे: (1) राजस्व-उत्पन्न करने वाले साधनों की कमी—राज्य की अर्थव्यवस्था अभी भी पर्यटन, कृषि और सीमित औद्योगिक आधार पर निर्भर है जिसकी आय अस्थिर है; (2) व्यय-रचना में बढ़ती प्रतिज्ञात्मक व अनुक्रियाशील रेखाएँ — वेतन, पेंशन, सब्सिडी व बिजली-उपयोग में व्यय जो अनुकूलन-योग्य नहीं होते — जिनसे वित्तीय लोच कम हो जाती है। परिणामस्वरूप विकास-परियोजनाओं के लिए उपलब्ध धन सिकुड़ता है और कई जिस्मानी (capex) या लंबी अवधि की परियोजनाएँ विलंबित या अधूरी रह जाती हैं, जो आर्थिक बहाली को धीमा कर देती हैं। (राजस्व-घाटा व प्रतिबद्ध व्यय संरचना पर विस्तृत विश्लेषण और सुझाव NITI तथा राज्य आर्थिक सर्वे में भी दिए गए हैं)।

समाधान स्पष्ट:-लेकिन तत्काल और ठोस प्रयास चाहिए: पहला, बजट-अनुशासन — गैर-प्राथमिक और अधिशेष व्यय पर रोक व पारदर्शी व्यय-प्राथमिकताएँ तय करना; दूसरा, राजस्व-विविधीकरण — हाइड्रोपावर (पर्यावरण व सामाजिक प्रभाव का समुचित आकलन करके), पर्यटन के टिकाऊ मॉडल, कृषि-मूल्य श्रृंखलाओं व छोटे उद्योगों के माध्यम से स्थायी कर एवं गैर-कर राजस्व बढ़ाना; तीसरा, कर्ज-पुनर्गठन और दीर्घकालिक ऋण-नीति — पुनर्वित्तन, ब्याज-भुगतान-प्रबंधन और लक्षित मुद्रीकरण योजनाओं से देनदारियों का समयबद्ध निदान; और चौथा, प्रशासनिक सुधार — राजस्व व इनवॉयस-बेस्ड कलेक्शन सुदृढ़ करना, अनियमितताओं के निपटारे व बकाया वसूली तेज़ करना। इन कदमों के बिना हिमाचल का आर्थिक स्थानिक लाभ (comparative advantage) और विकास-गति जोखिम में रहेगी।
हिमाचल की खूबसूरत भौगोलिक स्थिति और सामाजिक सूचकांकों पर उसकी उपलब्धियाँ राज्य को विशेष पहचान देती हैं। लेकिन यदि वित्तीय अनुशासन और राजस्व सुधारों पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो यह बढ़ता ऋण भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ बन सकता है। आर्थिक सतर्कता केवल विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।


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