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संपादकीय मंथन और चिंतन : हिमाचल की चेतावनी और बदलता भूगोल् व समय की चेतावनी

RamParkash Vats
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1 या तो हम चेतावनी को समझकर ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाएँ, या फिर हर वर्ष मानसून की त्रासदी झेलते रहें। सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी केवल कानूनी नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा की गूंज है।


हिमाचल प्रदेश के हालात पर सुप्रीम कोर्ट की बार-बार दी गई चेतावनी यह दर्शाती है कि समस्या केवल प्रकृति की मार नहीं, बल्कि शासन की उदासीनता और लापरवाही का परिणाम भी है। राज्य की सुरक्षा, रक्षा और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखना केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि हर नागरिक का नैतिक और मौलिक कर्तव्य है। जब पहाड़ों को काटा जाता है, नदियों को दोहा जाता है और जंगलों को उजाड़ा जाता है, तो यह केवल हिमाचल का नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र का नुकसान होता है।

प्रकृति समय-समय पर हमें चेतावनी देती है। लेकिन जब इन संकेतों की अनदेखी की जाती है, तो नतीजे प्रलयंकारी बन जाते हैं। मानसून के दौरान बार-बार आई बाढ़, भूस्खलन और जान-माल की हानि इसी की पुष्टि करते हैं। विज्ञान और तकनीक के इस युग में भी यदि हम प्राकृतिक चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो आने वाले वर्षों में हिमाचल के कई हिस्सों का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।

स वर्ष का मानसून हिमाचल के लिए अत्यंत दुखदायी रहा। इसका कारण केवल भारी वर्षा नहीं, बल्कि कई स्तरों पर कमजोरी भी रही।

सरकार की कमजोरी : आपदा प्रबंधन योजनाएँ कागज़ों तक सीमित रह गईं। चेतावनियाँ थीं, लेकिन कार्रवाई कमजोर रही।

अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रदेश सरकार को एक अलग आपदा प्रबंधन मंत्रालय का गठन करना चाहिए? ऐसा मंत्रालय प्रदेश के भौगोलिक, पर्यावरणीय, खनन, भवन और सड़क निर्माण, तथा औद्योगिक गतिविधियों पर समग्र दृष्टि रख सकता है। मौजूदा स्थिति में विभिन्न विभाग बिखरे हुए तरीके से काम कर रहे हैं, जिससे समन्वय का अभाव है। यदि एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया जाए तो आपदाओं की रोकथाम और प्रबंधन अधिक प्रभावी हो सकता है।

दि हर वर्ष ऐसी आपदाएँ आती रहीं और हमने उनसे सबक नहीं लिया, तो हिमाचल का भूगोल धीरे-धीरे बदल जाएगा। नदियों की धारा असामान्य हो जाएगी, पर्वत खिसकते रहेंगे, और गांव-शहर असुरक्षित हो जाएंगे। यह न केवल हिमाचल की प्राकृतिक पहचान को नष्ट करेगा, बल्कि पर्यटन और आजीविका पर भी गहरा असर डालेगा

सारगर्भित है कि आज हिमाचल एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। या तो हम चेतावनी को समझकर ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाएँ, या फिर हर वर्ष मानसून की त्रासदी झेलते रहें। सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी केवल कानूनी नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा की गूंज है। अब समय है कि सरकार, विभाग और जनता मिलकर हिमाचल की रक्षा के लिए ठोस संकल्प

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