न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

संकेतिक चित्र
2025 के मानसून ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि किस तरह से नदी, खड्ड और नाला—जो हमारी ज़िंदगी की धमनियाँ हैं—उनका रूपांतरण घटा है। अवैध कब्ज़ों, अनियंत्रित निर्माण और प्रशासन की सुस्ती ने नदी को खड्ड, खड्ड को नाला, और नाला को खूँट में तब्दील कर दिया है। जिसका विनाशकारी परिणाम वर्ष 2025 की बरसातों में आए तबाही रूप में सामने आया है। यह केवल जलमार्ग का विघटन नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—एक त्रासदी की संभावना का।
वास्तविक उदाहरण— चेतावनी का सच1.
उत्तराखंड, 5 अगस्त 2025 (उत्तारकाशी फ्लैश फ्लड)एक संभावित ग्लेशियल झरने (cloudburst) या ग्लेशियल झील विस्फोट से उतरकाशी के धाराली गांव में अचानक बाढ़ आई, जिसमें कम से कम 5 लोगों की मौत हुई और 50 से अधिक लोग लापता हुए। राहत में सेना, NDRF और SDRF जुटी रही।
2. किश्तवाड़, जम्मू-कश्मीर, 14 अगस्त 2025 (क्लाउडबर्स्ट फ्लैश फ्लड)एक भयंकर क्लाउडबर्स्ट ने चोसिटी गांव को तबाह कर दिया; 67 लोगों की जान गई, 300 घायल हुए और लगभग 200 लोग लापता। यात्री मार्ग पर स्थित सामुदायिक रसोई, घर और वाहन बह गए।
3. गुवाहाटी, मेघालय/असम, 20 मई 2025 (शहरी बाढ़)तेज़ बारिश, दुर्गम जल निकासी और जल संचित क्षेत्रों पर कब्ज़े ने गुवाहाटी शहर को 720 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में डुबो दिया।
4 हिमाचल प्रदेश में लैंड लैंड स्लाइडिंग, भू-कटाव, वादलो का फटना, बाढ के तांडव ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिये है। हिमाचल प्रदेश में आर्थिक नुकसान लगभग 12 हजार करोड़ से भी ज्यादा हुआ है। जानमाल का नुक्सान अनुमानित सैंकड़ों में है। बांधो के जलश्य में लाशें का मिलना जारी है
5 पंजाब ममें बाढ के पानी ने हाहकार मचाया है पंजाब का भूगोल बदल कर रख दिया है। चारो तरफ जल प्रलय मचा रहा है ।
यह साफ़-साफ़ दर्शाता है कि शहरी विस्तार और जल मार्गों का अवैध उपयोग किस तरह विपत्तियों को आमंत्रित कर रहा है।—प्रस्तावनानदियाँ महज़ जलधाराएँ नहीं ,ये भौगोलिक, पारिस्थितिक, और सामाजिक संरचनाएँ हैं। लेकिन जब इन स्रोतों को अवैध कब्ज़ों, भवन निर्माण और इक्का-दुक्का प्रशासनिक उदासीनता ने बदल दिया, तो मानसून के उस पारदर्शी भँवरे ने तबाही की गहरी छाप छोडी़ है।
वर्ष 2025 की बेमौसम या अतिवृष्टिपूर्ण बारिश केवल मौसम की देन नहीं
यह पर्यावरणीय अपराध का प्रतिफल है। अवैध निर्माणों ने जलप्रवाह को रोक दिया, जिससे वैश्विक जलधाराओं में अवरोध उत्पन्न हुए। प्रशासन ने या तो जानबूझकर इन धारा अवरोधों को नजरअंदाज़ किया, या स्थानीय दबावों और राजनीतिक संरक्षण के कारण कार्रवाई टाल दी।प्रशासनिक विफलताकाग़जी नियमों और वास्तविकता के बीच खाई पहले से गहरी थी। राजस्व विभाग का काम अवैध कब्ज़ों पर कार्यवाही करना है, लेकिन 2025 की आपदाएँ यह सवाल उठाती हैं कि आखिर नियंत्रण कब किया जाएगा? स्थानीय नेताओं द्वारा निर्मित “सामझौते” और राजनीतिक संरक्षण ने नदी-नालों को संरक्षित नहीं होने दिया।अब क्या हो
उपाय अपनाना ज़रूरी है
1. नदी-नालों का डिजिटल सीमाांकन और मानचित्रणहर जलधारा का वेब और डिजिटल मैप होना चाहिए, जिससे कब्ज़े स्पष्ट हों और जवाबदेही सुनिश्चित हो।
2. कब्ज़ों पर सख़्त, निष्पक्ष कार्रवाईचाहे राजनीतिक समर्थन कितना भी हो, नियमों का पालन हर हाल में किया जाए।
3. वापस बसाने (पुनर्वास) की योजनाएँअनजाने में या पूर्व स्वीकृति से बसे परिवारों का सम्मान और पुनर्वास ज़िम्मेदारी से करना आवश्यक है।
4. भविष्य के लिए नीति तैयार करनाएक लंबी अवधि की नीति बनाई जाए जिससे नदी-नालों के किनारे किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित हो—स्थायी और स्पष्ट कानूनों के साथ।
5. जन-जन में जागरूकता फैलानाजनता को यह समझाने में सहयोग करें कि नदी-नाले केवल पैनियों का मार्ग नहीं, हमारी ज़िंदगी की रक्षा हैं।
सारगर्भित है कि2025 की मानसून बाढ़ों ने यह संदेश दिया है: अगर हमें भविष्य में और बड़ी त्रासदियों से बचना है, तो हमें अब—फौरन—कार्रवाई करनी होगी। अवैध कब्ज़ सिर्फ़ काग़ज़ों का उल्लंघन नहीं; यह पर्यावरण और मानव समुदाय दोनों को आत्मघाती रूप से नुकसान पहुँचा रहा है। राजस्व विभाग, प्रशासन और नागरिक एक साथ मिलकर यह संकल्प लें—नदियाँ, नालियाँ और खड्ड पहले जैसी रहें। यह हमारी सुरक्षा, जिम्मेदारी और आने वाली पीढ़ियों की विरासत है।

